रवि ने जब वो रेशमी नाइटीज स्नेहा के सामने फैलाईं, तो स्नेहा उन्हें कौतूहल से देख रही थी। उसने एक गुलाबी साटन की नाइटी हाथ में ली और उसकी बनावट को महसूस किया।
1. साइज और संस्कृति की बात
स्नेहा ने धीरे से कहा, "पापा, ये कपड़े अजीब तो नहीं हैं... लेकिन शायद मम्मी को फिट नहीं आएंगे। आपको शायद उनके साइज का सही अंदाजा नहीं था। वो इसे पहनकर सहज महसूस नहीं करेंगी।" फिर उसने थोड़ा झिझकते हुए पूछा, "पर पापा... अरब देशों में ऐसे छोटे और खुले कपड़े कैसे मिल सकते हैं? मैंने तो सुना था कि वहाँ सिर्फ बुर्के चलते हैं और लोग बहुत ढके हुए रहते हैं।"
रवि ने एक गहरी सांस ली और हल्का मुस्कुराया, जैसे किसी नासमझ बच्चे को दुनिया का ज्ञान दे रहा हो।
"बेटा, यही तो गलतफहमी है। बाहर की दुनिया में लोग जो देखते हैं, वो अलग होता है। वहाँ बाहर बुर्के जरूर चलते हैं क्योंकि वहाँ की संस्कृति वैसी है, लेकिन घरों के अंदर? वहाँ बहुत गर्मी होती है बेटा। इतनी तपती गर्मी कि इंसान का दम निकल जाए। इसलिए घरों के अंदर औरतें बहुत ही हल्के और आरामदायक (Comfortable) कपड़े पहनती हैं ताकि उन्हें हवा लगती रहे।"
2. पिछड़ेपन का ताना और मॉर्डन सोच
रवि ने अपनी आवाज में थोड़ी निराशा भर ली। "मेरे साथ ऑफिस में काम करने वाले जितने भी दोस्त थे, सबने अपनी पत्नियों और बेटियों के लिए ऐसे ही कपड़े खरीदे। मैं क्या बताता उन्हें? कि मेरा परिवार अभी भी पुराने जमाने के ख्यालों में जी रहा है?"
उसने स्नेहा की आंखों में देखते हुए अपनी बात जारी रखी, "मैं बस यह चाहता था कि तुम्हारी मम्मी इस तपती गर्मी में उस भारी-भरकम साड़ी और ब्लाउज से थोड़ी राहत पाए। दिन भर वो रसोई में काम करती है, पूरा बदन पसीने से भीगा रहता है, चिड़चिड़ापन होता है। क्या फायदा ऐसे ठेठ कपड़ों का जो गर्मी में आपकी हालत खराब कर दें? लेकिन तुम्हारी मम्मी को लगता है कि ये सब 'गलत' है। मुझे दुख होता है कि हम लोग सोच में इतने पीछे रह गए हैं।"
3. स्नेहा के मन में बीज बोना
रवि ने बहुत ही चतुराई से स्नेहा की ओर इशारा किया, "तुम खुद देखो, तुम भी दिन भर सूट या भारी कपड़ों में रहती हो। क्या तुम्हें गर्मी नहीं लगती? हमारे साथ के लोगों ने जब ये सब खरीदा तो मैंने भी सोचा कि शायद तुम लोग इसे पहनोगे तो तुम्हें अच्छा लगेगा। पर मुझे क्या पता था कि यहाँ इसे 'पिछड़ेपन' की नजर से देखा जाएगा।"
रवि मन ही मन जानता था कि स्नेहा के लिए ये कपड़े पहनना फिलहाल नामुमकिन सा है, लेकिन उसने 'गर्मी' और 'मॉर्डन होने' का जो तर्क दिया था, उसने स्नेहा को सोचने पर मजबूर कर दिया। उसे अब वो नाइटीज़ 'गंदी' नहीं, बल्कि 'जरूरत' और 'राहत' का जरिया लगने लगी थीं।
रवि ने उदास होकर अपना चेहरा फेर लिया, "छोड़ो बेटा, अगर मम्मी को पसंद नहीं तो क्या कर सकते हैं। मैं तो बस तुम लोगों का ख्याल रख रहा था।"
स्नेहा चुपचाप उन कपड़ों को देख रही थी। उसके मन में अब द्वंद्व चल रहा था—एक तरफ संस्कार थे और दूसरी तरफ पापा की वो दलील, जो बहुत ही लॉजिकल लग रही थी।
2. रवि की 'रणनीतिक' उदासी
रवि ने अपना चेहरा लटका लिया और सूटकेस की चैन बंद करने का नाटक करने लगा। उसकी आवाज़ में एक गहरी निराशा थी। "खैर छोड़ो... मैं तो तुम लोगों के भले की सोचकर तुम्हारे लिए भी कुछ अच्छे कपड़े लाया था। मुझे लगा था कि तुम और तुम्हारी मम्मी अब थोड़े आधुनिक ख्यालों के हो गए होगे। पर ये सब देखना और दिखाना ही बेकार है।"
उसने एक ठंडी आह भरी, "इन्हें सूटकेस में ही पड़ा रहने देना चाहिए। तुम्हारी मम्मी से तो कुछ कहने का मतलब ही नहीं है, उनकी सोच तो वहीं अटकी है। पर तुम्हें देखकर भी लग रहा है कि तुम लोग काफी पिछड़े ही चल रहे हो। बेटा, मैं तुम्हें ये बाहर पहनकर जाने को थोड़े ही बोल रहा था? घर में तो इंसान कम्फर्टेबली रह ही सकता है। पर ठीक है, अब से मैं किसी के लिए कोई तोहफा नहीं लाऊंगा। सब लाना ही बेकार है।"
रवि इतना कहकर जैसे ही उठने लगा, उसकी आँखों में एक बनावटी दर्द था जिसे देखकर स्नेहा का दिल पसीज गया।
3. स्नेहा का आत्मसमर्पण और वह 'ट्रायल'
"नहीं पापा! ऐसी कोई बात नहीं है," स्नेहा ने जल्दी से उसका हाथ पकड़ते हुए कहा। उसकी आवाज़ में घबराहट थी। "मैं पहन सकती हूँ... पर मुझे बस डर लगता है कि मम्मी देखेंगी तो डांटेंगी।"
रवि ने पलटकर उसकी आँखों में देखा, उसकी नज़रों में अब एक मखमली दबाव था। "मम्मी तो अभी घर में हैं नहीं। और इसमें डांटने वाली क्या बात है? ये सिर्फ एक ड्रेस है बेटा। खैर, तुम्हारी मर्जी... तुम भी उन्हीं पुरानी लकीरों पर चलना चाहती हो तो चलो।"
स्नेहा ने उस गुलाबी साटन की नाइटी को फिर से देखा। वह सोच रही थी कि यह ड्रेस इतनी भी बुरी नहीं है। यह एक फ्रॉक की तरह ही तो है, बस ऊपर स्ट्रैप थोड़े पतले हैं जिससे कंधे थोड़े ज़्यादा नज़र आते हैं। पापा की 'पिछड़ेपन' वाली बात उसे चुभ गई थी। वह खुद को मॉडर्न साबित करना चाहती थी।
"ठीक है पापा... मैं पहनकर दिखाती हूँ," स्नेहा ने फुसफुसाते हुए कहा और ड्रेस लेकर बाथरूम में चली गई।
जब वह बाहर आई, तो रवि की साँसें जैसे रुक गईं। उस गुलाबी साटन ने स्नेहा के उभरते बदन को पूरी तरह जकड़ लिया था। पतली स्ट्रैप्स की वजह से उसके गोरे कंधे और उसकी गर्दन की सुराहीदार बनावट साफ झलक रही थी। साटन का कपड़ा उसके वक्षों की गोलाई पर इस तरह चिपका था कि उसके निपल्स का उभार भी हल्की लकीरें बना रहा था।
रवि ने उसे एक पिता की तरह गले लगाया, लेकिन उसका पूरा शरीर स्नेहा की जवानी की उस कोमलता को महसूस कर रहा था।
अध्याय 21: रेशम की दलीलें और अनकहा आकर्षण
स्नेहा ने जब वह गुलाबी साटन की नाइटी पहनी, तो वह आईने में खुद को देख रही थी। ऊपर का हिस्सा उसकी छाती पर काफी कसा हुआ था, जिससे उसके वक्षों की उभार साफ़ झलक रही थी par wo niighty ke andar thi puri tarah dhaki hui aur isi wajah se wo Papa ke samne jaane ki himmat bhi kar saki par वह thoda अनकंफर्टेबल महसूस कर रही थी और अनजाने में ही उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर क्रॉस करके खुद को ढंकने की कोशिश की थी।
जब वह कमरे में आई, तो रवि ने उसकी बॉडी लैंग्वेज को तुरंत ताड़ लिया।
1. रवि का 'इमोशनल दांव'
रवि ने बड़ी उदासी से अपना सिर हिलाया। "स्नेहा, मुझे लगता है तुम बहुत अनकंफर्टेबल हो। बेटा, मुझे नहीं लगता कि तुम लोगों से बात करके कोई फायदा है। मैं तो बस यहाँ की तपती गर्मी देखकर तुम्हारे लिए ये समर ड्रेसेस लाया था। दुबई में मैंने देखा था कि मेरे सभी दोस्त अपनी बीवियों और बेटियों के लिए ऐसी ही चीजें खरीदते थे। वे लोग वहां बहुत फ्री रहते हैं... शॉपिंग मॉल्स जाना, साथ में डिनर करना, हंसना-बोलना... पर शायद तुम लोग इस मॉडर्न लाइफस्टाइल को एड्रेस ही नहीं कर पाओगे।"
रवि ने एक गहरी सांस ली और मुड़ गया। "जाओ बेटा, इसे बदल लो। बेकार है सब। मुझे लगा था 5 साल बाद हम ghoomenge firenge enjoy karengee, पर तुम bhi apni mummy ki tarah बहुत पीछे रह गई हो। मैं तुम logon ke साथ क्वालिटी टाइम बिताना चाहता था, पर तुम log तो मुझसे बहुत दूर हो चुकी हो।"
2. स्नेहा का संकोच और रवि की 'तर्कशक्ति'
रवि की बातों ने स्नेहा के दिल पर चोट की। उसे लगा कि वह वाकई अपने पापा को निराश कर रही है। उसने धीरे से अपने हाथ नीचे किए। "नहीं पापा, ऐसी बात नहीं है। बस... थोड़ा अजीब लग रहा है।"
"अजीब क्या है इसमें?" रवि ने झुंझलाते हुए कहा। "मैं भी तो घर में हाफ पैंट और गंजी में घूमता हूँ, तो क्या तुम मुझे देखना छोड़ देती हो? ये बस कपड़े हैं बेटा। तुम मुझे अपना दोस्त क्यों नहीं मानती? तुम अब बड़ी हो चुकी हो, or kadhe ke barabar beti baap ki dost hoti hai. तुम्हें समझदार होना चाहिए। खैर, जाओ और बदल लो... पैसे तो लगता है पानी में ही चले गए।"
स्नेहा को अब बुरा लग रहा था। पापा की उदासी उसे ब्लैकमेल कर रही थी। "नहीं पापा, कोई दिक्कत नहीं है। साइज़ तो बिल्कुल परफेक्ट है... मेरी ही साइज़ की लग रही है।"
रवि ने मन ही मन सोचा, 'तुम्हारी ही साइज़ की है बेटा, क्योंकि मैंने घंटों तुम्हें सोते हुए निहारा है और तुम्हारे बदन के हर इंच का नाप मेरी आँखों में बसा है।'
3. दूसरी ड्रेस और बढ़ती नजदीकी
रवि ने अपनी आवाज़ थोड़ी नरम की। "अगर दिक्कत नहीं है, तो ठीक से रहो। वह दूसरी वाली ड्रेस भी ट्राई करके दिखाओ ना? देखूँ तो सही कैसी लगती है। मम्मी को आने में अभी दो घंटे लगेंगे, तब तक हम आराम से बैठकर बातें कर सकते हैं।"
स्नेहा फिर से तैयार हो गई। इस बार उसने वह गहरे नीले रंग की स्लीवलेस ड्रेस पहनी जो घुटनों tak hi थी। जब वह कमरे में आई, तो रवि की नज़रों ने उसे ऊपर से नीचे तक जैसे पी लिया।
इस बार स्नेहा उतनी घबराई हुई नहीं थी, लेकिन वह अभी भी अपनी जाँघों के खुलेपन को लेकर सतर्क थी। रवि ने देखा कि उसकी घुटनों के नीचे की चिकनी टांगें और उसके सुडौल, गोरे कंधे उस मद्धम रोशनी में चमक रहे थे। साटन का कपड़ा उसके चलते वक्त उसकी जाँघों से रगड़ खा रहा था, जो एक मादक आवाज़ पैदा कर रहा था।
"बेटा, तुम बहुत प्यारी लग रही हो," रवि ने अपनी आवाज़ को जितना हो सके 'पिता तुल्य' और सौम्य रखते हुए कहा, जबकि उसके अंदर एक तूफ़ान उठ रहा था। "कितनी अच्छी तो है ये ड्रेस। पता नहीं तुम्हें इसमें क्या बुराई दिखती है। देखो, इसमें कितनी हवा लग रही होगी। क्या तुम्हें अब गर्मी में आराम नहीं मिल रहा?"
"आराम तो है पापा... पर ये थोड़ी छोटी है," स्नेहा ने सोफे के किनारे बैठते हुए अपनी ड्रेस को नीचे खींचने की कोशिश की।
4. सोफे पर वह दस मिनट
"अरे छोटी? tumhaare bachpan me schoolki unifrm isse choti thi or waise bhi aajkal to sabhi half pant tshirt pahnte hain," रवि ने उसके पास सोफे पर बैठते हुए कहा। उसकी जांघ स्नेहा की जांघ से बस कुछ ही इंच की दूरी पर थी। "दरवाज़ा बंद है, कोई आने वाला नहीं है। बस दस मिनट मेरे साथ बैठकर बातें करो। एन्जॉय करो इस पल को। यार, तुम एक काम क्यों नहीं करती? वह तीसरी वाली ड्रेस भी दिखा ही दो... फिर सब खत्म।"
स्नेहा अब पूरी तरह पापा के प्रभाव में थी। उसे लग रहा था कि पापा aisa kuch galat bhi nahi bol rahe or uski friends to pahanti hi thin or wakai me garmi me dikkat to hoti hai or isme free to lag raha tha par papa ke samne thoda ajeeb, par papa to वाकई उसे एक दोस्त की तरह देख रहे हैं। "ठीक है पापा, बस आखिरी वाली," वह मुस्कुराई और उठकर फिर से बदलने चली गई।
रवि वहीं सोफे पर बैठा रहा, उसके दिमाग में स्नेहा के उन नंगे कंधों और साटन में कैद उसके शरीर की छवियाँ नाच रही थीं। उसे पता था कि वह धीरे-धीरे स्नेहा की झिझक की दीवारें तोड़ रहा है। वह उस 'दोस्ती' के पर्दे के पीछे उस अनकहे और वर्जित आकर्षण को और गहरा कर रहा था।
कमरे में हल्की रोशनी है। रवि ने स्नेहा को अपनी बाहों के घेरे में (Side Hug) ले रखा है। स्नेहा को अपने पिता के शरीर की मजबूती और उनके परफ्यूम की तीखी खुशबू महसूस हो रही है।
रवि: (दुखी होने का नाटक करते हुए) "थैंक्स बेटा... कम से कम तुमने तो मेरा मान रखा। वरना तुम्हारी मम्मी ने तो आज मेरा कलेजा ही चीर दिया। इतनी मेहनत से, एक-एक ड्रेस मैंने तुम्हारे और उनके लिए चुनी थी, पर उन्हें तो बस कमियां निकालनी आती हैं। मुझे तो लगता है मैं बेकार ही यहाँ आया, तुम लोग मेरे बिना ही खुश थे।"
स्नेहा का दिल पसीज जाता है। उसे अपने पिता की उदासी बर्दाश्त नहीं होती। वह अपनी पकड़ रवि के कंधे पर थोड़ी और मजबूत कर लेती है। तभी वह हिचकिचाते हुए पूछती है:
स्नेहा: "पापा... क्या इसी बात पर आपने मम्मी को मारा भी था? मुझे अंदर से चीखने की आवाजें आई थीं।"
रवि: (हड़बड़ाते हुए) "अ..अरे? नहीं... नहीं तो! स्नेहा, तुम ये क्या... मेरा मतलब है... वो... तुम अभी बच्ची हो। वो तो बस... बस हम बातें कर रहे थे। मतलब मम्मी तुम्हारी... वो थोडा सा... चिल्ला उठी होंगी किसी बात पर।"
रवि का यह लड़खड़ाना, उसकी जुबान का फिसलना और उसका चेहरा लाल होना—स्नेहा की तेज नजरों से छुप नहीं सका। उसे पहली बार लगा कि उसने अपने 'स्मार्ट' पापा को पकड़ लिया है।
स्नेहा का मन:वह अंदर ही अंदर हंस पड़ी। उसे एक अजीब सी जीत का अहसास हुआ। 'ओह! तो पापा डर गए? कैसे हड़बड़ा रहे हैं जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। इसका मतलब मेरा शक सही था... मम्मी की वो चीखें... वो दर्द की नहीं थीं। पापा ने वाकई इस उम्र में भी मम्मी की हालत खराब कर दी।'
स्नेहा को याद आया कि मम्मी हमेशा शांत और गंभीर रहती हैं, लेकिन पापा के आते ही घर का तापमान बढ़ गया है। वह सोचने लगी— 'शायद ये 5 सालों की जुदाई का असर है... पापा इतने भूखे थे कि मम्मी संभाल नहीं पाईं।'
तभी अचानक उसे अपनी सोच पर शर्म आ गई स्नेहा (मन ही मन): 'छी! स्नेहा, तू ये क्या सोच रही है? अपने ही पापा के बारे में ऐसी गंदी बातें? पागल हो गई है क्या? वो तेरे पिता हैं... छी, ये सब सोचना बंद कर!'
रवि: "चलो, अब बहुत बातें हो गईं। जाओ अपनी पढ़ाई करो, मुझे थोड़ा अकेला छोड़ दो।"
रवि का यह अचानक उसे 'बच्ची' कहना और खुद से दूर करना स्नेहा को चुभ जाता है। वह कमरे से बाहर तो निकलती है, पर उसके पैर भारी हैं।
स्नेहा का आंतरिक संघर्ष (Internal Monologue):वह सीढ़ियों पर रुक जाती है। उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी है। 'बच्ची? पापा अभी भी मुझे वही छोटी स्नेहा समझ रहे हैं? उन्हें क्या लगता है मुझे कुछ समझ नहीं आता? मुझे पता है मम्मी की वो चीखें दर्द की नहीं थीं... मैं सब जानती हूँ कि बंद कमरे में क्या होता है।'
उसे इस बात पर गुस्सा आ रहा है कि रवि उसे 'नासमझ' समझ रहा है। साथ ही, उसे अपनी माँ पर चिढ़ होने लगती है। 'मम्मी कितनी पत्थर दिल हैं। पापा उनके लिए इतना कुछ लाए, और मम्मी ने तमाशा खड़ा कर दिया। बेचारे पापा...'
दृश्य: उदासी का मुखौटा और नया प्रलोभन
स्नेहा अपने कमरे की ओर बढ़ रही थी, पर उसके दिमाग में अभी भी उन ड्रेसेस की बात घूम रही थी। उसे याद आया कि पापा ने कहा था कि अभी तो और भी कपड़े हैं। 'आखिर वो ड्रेस कैसी होंगी? क्या पापा ने कोई स्टाइलिश सूट या कुर्ती ली होगी?' एक लड़की होने के नाते उसकी उत्सुकता उसे रोक न सकी और वह वापस पापा के कमरे की ओर मुड़ गई।
लेकिन जैसे ही उसने अंदर कदम रखा, वह ठिठक गई। कमरे की खिड़की के पास रवि अकेला खड़ा था, नजरें आसमान की ओर थीं और हाथ में एक जलती हुई सिगरेट थी। उसके चेहरे पर इतनी गहरी उदासी और थकान थी कि स्नेहा का दिल बैठ गया।
स्नेहा: "पापा... आप इतने उदास क्यों हैं? क्या हुआ?"
रवि चौंक गया, उसने हड़बड़ाहट में अपनी सिगरेट पीछे छिपाई और चेहरा फेर लिया।
रवि: (बुझी हुई आवाज़ में) "नहीं बेटा... कुछ नहीं। बोलो, तुम वापस क्यों आई?"
स्नेहा: "पापा, आप कह रहे थे न कि और भी ड्रेसेस हैं... वो कैसी हैं? क्या मैं देख सकती हूँ?"
रवि ने अचानक उसे झिड़क दिया, जैसे कोई बहुत बड़ा घाव हरा हो गया हो।
रवि: "छोड़ो स्नेहा! तुम लोग ये सब तो पहन नहीं पा रहे हो, मेरा पहले ही मूड खराब है। वो ड्रेसेस तो... वो तो ...। तुम उनके बारे में बात ही मत करो। समझो कि मेरे पैसे पानी में बह गए। जाओ, यहाँ से जाकर पढ़ाई करो। मैं पहले ही ऑफिस के टेंशन में हूँ, पता नहीं मैं वापस ही क्यों आया!"
स्नेहा सहम गई। उसने पापा को पहले कभी इतना टूटते हुए नहीं देखा था। वह उनके करीब गई और उनका हाथ पकड़ा।
स्नेहा: "पापा... प्लीज ऐसे मत बोलिए। क्या टेंशन है? मुझे बताइए न।"
रवि ने एक लंबी सांस ली और स्नेहा को अपने पास बिस्तर पर बैठने का इशारा किया। स्नेहा जब बैठी, तो रवि ने बहुत करीब होकर बात करना शुरू किया। उसकी आवाज़ अब धीमी और रहस्यमयी हो गई थी।
रवि: "सुनो बेटा... ऑफिस की एक बहुत बड़ी पार्टी होने वाली है। वहाँ company के टॉप एग्जीक्यूटिव्स आने वाले हैं। यह सिर्फ पार्टी नहीं है, मेरा करियर और प्रमोशन इसी पर टिका है। वहाँ सब अपनी वाइफ्स को लेकर आते हैं। वो औरतें महीनों तैयारी करती हैं, अपनी बॉडी को फिट रखती हैं, उनकी ज्वेलरी और गाउन सब ए-क्लास होते हैं। वहाँ जिसका इम्प्रेशन अच्छा होता है, तरक्की उसी की होती है।"
रवि ने रुककर स्नेहा की आंखों में देखा, और फिर दुखी होकर अपनी गर्दन झुका ली।
रवि: "पर तुम्हारी मम्मी को देखो... उन्हें इस दुनिया की कोई समझ नहीं है। उनका दिमाग किचन और पुराने रिवाजों से बाहर निकलता ही नहीं। तुम्हें लगता है कि वो उस पार्टी में मेरा साथ दे पाएंगी? मैं उनसे कहूँगा कि अपनी बॉडी पर ध्यान दो, थोड़ा मॉडर्न मेकअप करो, तो वो भड़क जाएंगी। मुझे समझ नहीं आ रहा मैं उस पार्टी में क्या करूँगा... मेरा करियर डूब जाएगा।"
रवि का हाथ बात करते-करते अनजाने में स्नेहा के घुटने पर टिका हुआ था। उसकी उंगलियां हलचल कर रही थीं, जिससे स्नेहा के शरीर में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी।
रवि: (स्नेहा के चेहरे के और करीब आते हुए) "कभी-कभी लगता है काश तुम्हारी मम्मी भी तुम्हारी तरह समझदार होतीं। तुम अगर उस पार्टी में होतीं तो शायद सब तुम्हें ही देखते रह जाते।"
स्नेहा की सांसें अटक गईं। पापा की ये बातें... ये तारीफ... उसे 'बच्ची' से एक 'औरत' होने का अहसास करा रही थीं। उसे समझ आ गया कि पापा का प्रमोशन खतरे में है और मम्मी इसमें उनकी कोई मदद नहीं कर सकतीं।
स्नेहा (मन ही मन): 'पापा कितने बेबस हैं। मम्मी को सच में कुछ समझ नहीं है। क्या मुझे पापा की मदद करनी चाहिए? आखिर पापा का करियर दांव पर है...'
कमरे में सन्नाटा था, लेकिन रवि की आंखों की गर्मी स्नेहा को एक ऐसी दुनिया की ओर खींच रही थी जहाँ fun aur excitement thi.
दृश्य: जज्बाती दूरी और अंतिम चाल
स्नेहा जब रवि के कमरे में उन ड्रेसेस के बारे में पूछने आई थी, तो उसका मन उत्साह से भरा था। लेकिन रवि का बर्ताव किसी ठंडी फुहार जैसा था।
रवि: (कठोरता से) "छोड़ो स्नेहा, तुम क्या करोगी जानकर? जब तुम्हारी मम्मी को ही परवाह नहीं है, तो तुम क्यों बीच में आ रही हो? जाओ, अपना काम करो और पढ़ाई पर ध्यान दो। तुम्हारे बस का कुछ नहीं है।"
स्नेहा ने अपना मुँह टेढ़ा किया और पैर पटकती हुई बाहर निकल गई। मन ही मन वह झुंझला रही थी— 'एक तो पापा की मदद करने जाओ, ऊपर से वही डांट सुनने को मिलती है। वैसे भी मम्मी ने पहले ही सुबह से दिमाग चाट रखा है।' शांति ने सुबह उसे बेवजह टोक दिया था कि वह सारा दिन आईने के सामने क्या करती रहती है, जिससे स्नेहा का मूड पहले ही बिगड़ा हुआ था। उसने तय कर लिया कि वह अब इन दोनों के फटे में टांग नहीं अड़ाएगी।
लेकिन अगले दो दिन रवि ने जो खेल खेला, उसने स्नेहा के संकल्प को तोड़ दिया।
रवि का 'इमोशनल ड्रामा':रवि अब घर में एक साये की तरह घूमने लगा। वह स्नेहा से नजरें नहीं मिलाता, बस उदास होकर कोने में बैठा रहता। जैसे ही शांति बाजार जाती या अपनी सहेलियों से मिलने निकलती, रवि छुपकर शराब निकालने लगता। वह जानबूझकर स्नेहा को अपनी बेबसी की झलकियाँ दिखाता—कभी कांपते हाथों से बोतल पकड़ना, तो कभी गहरी, लंबी आहें भरना।
शांति को भी कुछ शक हुआ, उसने एक-दो बार पूछा भी, "क्या बात है? आप कुछ परेशान लग रहे हैं।" लेकिन रवि ने उसके सामने एक नकली मुस्कान ओढ़ ली, "कुछ नहीं शांति, ऑफिस के छोटे-मोटे काम हैं। तुम फिक्र मत करो... तुम ऐसा करो, बाजार से कुछ सामान ले आओ या अपनी सहेलियों के पास चली जाओ, तुम्हें भी तो थोड़ा आराम चाहिए।"
जैसे ही शांति घर से बाहर गई, रवि ने अपना असली दांव चला। उसने देखा कि स्नेहा बगल के कमरे में है और उसकी बातें सुन सकती है। उसने अपने फोन पर एक 'काल्पनिक' दोस्त को कॉल लगाया और अपनी आवाज़ में दर्द और बेबसी भर ली।
रवि: (फोन पर, सुना-सुनाकर) "यार... अब बर्दाश्त नहीं हो रहा। तुझे पता है बॉस ने मुझे पर्सनली इन्वाइट किया है उस पार्टी के लिए। वहाँ न जाना मतलब अपनी नौकरी पर लात मारना है। प्रमोशन तो छोड़, इस उम्र में अगर नौकरी चली गई तो मैं कहाँ जाऊँगा? मैंने इतने इन्वेस्टमेंट्स कर रखे हैं, स्नेहा की पढ़ाई है, कल को उसकी शादी करनी है... इतनी जिम्मेदारियां हैं कि सर फटा जा रहा है।"
वह एक लम्बा घूँट शराब का भरता है और भारी आवाज़ में जारी रखता है।
रवि: "पर तुम्हारी भाभी... वो समझने को तैयार ही नहीं हैं। हाई सोसाइटी में कैसे रहा जाता है, वो अपनी एक वाइब एडजस्ट नहीं कर सकतीं। थोड़ा सा भी खुद को चेंज नहीं कर सकतीं मेरे लिए। कभी-कभी तो मन करता है कि सब छोड़-छाड़ कर सुसाइड कर लूँ... पर बस अपनी बच्ची का चेहरा देख कर रुक जाता हूँ। उस बेचारी का क्या कसूर? पर ये बॉस की डांट और ये घुटन... अब सहा नहीं जाता। इसी गम में अब शराब ही सहारा लगती है।"
रवि ने जैसे ही फोन रखा, उसने एक गहरी सिसकी भरी। दीवार के पीछे खड़ी स्नेहा का कलेजा मुंह को आ गया। उसके पिता, जो उसके लिए एक हीरो की तरह थे, आज अपनी जान देने की बात कर रहे थे। उसे लगा कि उसकी मम्मी की जिद्द उसके पापा की जान ले लेगी।
वह अब खुद को रोक नहीं पाई। वह धीरे से कमरे के अंदर आई। कमरे में शराब की तीखी गंध और उदासी का धुआं फैला था। रवि ने उसे देखते ही अपनी आँखों के किनारे पोंछे और बोतल छुपाने की कोशिश की।
रवि: (हड़बड़ाते हुए) "स्नेहा? तुम... तुम यहाँ कब आईं? जाओ बेटा, तुम पढ़ाई करो। मैंने कहा न, ये बड़ों के मामले हैं।"
स्नेहा: (रुंधे गले से) "पापा, बस कीजिए! मैंने सब सुन लिया। आप अकेले ये सब क्यों झेल रहे हैं? क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूँ? क्या मेरा कोई हक नहीं है आपकी मदद करने का?"
रवि ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखें लाल थीं (शायद शराब से या नकली आंसुओं से)। उसने स्नेहा का हाथ पकड़कर उसे अपने पास बिठाया। उसके स्पर्श में एक थरथराहट थी जो स्नेहा के अंदर तक उतर गई।
रवि: (फुसफुसाते हुए) "तुम क्या करोगी बेटा? तुम तो अभी बच्ची हो। तुम उस दुनिया को नहीं जानती। तुम्हारी मम्मी मेरा साथ नहीं देंगी... और मैं तुम्हें इस सब में घसीटना नहीं चाहता।"
दृश्य: 'इस्कॉर्ट' का खौफ और स्नेहा का कश्मकश
agle din शांति के घर से निकलते ही रवि ने फिर से फोन उठाया। वह जानता था कि स्नेहा किचन की दीवार से सटकर एक-एक शब्द सुनने की कोशिश कर रही है। उसने अपनी आवाज़ में गुस्सा, बेबसी और शराब का नशा मिलाया।
रवि: (फोन पर चिल्लाते हुए) "क्या बकवास कर रहा है तू? दिमाग खराब हो गया है तेरा? एक लड़की भाड़े पर लूँ? इस्कॉर्ट? भाई, तू पागल हो गया है! मुझे पता है बाकी लोग ऐसा करते होंगे, उन्हें अपनी तरक्की से मतलब है, पर मैं अपने परिवार से प्यार करता हूँ। मैं किसी दूसरी गैर-औरत को अपनी बीवी बनाकर पार्टी में ले जाऊँ... मेरा जमीर इसकी इजाजत नहीं देता!"
रवि एक लम्बा घूँट भरता है और मेज पर हाथ मारता है।
रवि: "हाँ, मैं जानता हूँ एक्टिंग ही करनी है! उस लड़की को सिर्फ दिखावा करना है कि वो मेरी बीवी है। पर भाई, किसी अनजान औरत को साथ खड़ा करना और उसे दुनिया के सामने अपनी पत्नी बताना... नहीं यार! भले ही मेरा करियर डूब जाए, भले ही मेरी नौकरी चली जाए, पर मैं अपनी बीवी के साथ ये धोखा नहीं कर सकता। तू रख फोन, मेरा दिमाग फट रहा है! सॉरी भाई, मैं नशे में हूँ... मुझे लगता है मैं पागल हो जाऊँगा।"
रवि ने फोन पटक दिया और अपना सिर पकड़कर बैठ गया। दीवार के पीछे खड़ी स्नेहा का दिमाग चकरा गया।
स्नेहा का आंतरिक संघर्ष:उसकी आँखों में आँसू आ गए। 'पापा कितने महान हैं। उनका करियर दांव पर है, नौकरी जा सकती है, लेकिन वो मम्मी को चीट करने के बारे में सोच भी नहीं सकते। वो किसी अनजान 'भाड़े की लड़की' को छूना भी नहीं चाहते।'
लेकिन तभी उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। 'अगर उस पार्टी में मम्मी को किसी ने नहीं देखा है... और पापा को बस एक बार के लिए किसी को बीवी बनाकर ले जाना है... तो क्या कोई और नहीं हो सकता? कोई ऐसा जो अपना हो? जिस पर पापा भरोसा कर सकें?'
उसे याद आया कि वह उन ड्रेसेस में कैसी लग रही थी। पापा ने कहा था कि वह बहुत खूबसूरत और बड़ी दिखती है। स्नेहा का दिल तेजी से धड़कने लगा। एक अजीब सा विचार उसके मन में आया— "अगर मम्मी नहीं जा सकतीं, और पापा किसी अनजान औरत को ले जाना नहीं चाहते... तो क्या मैं पापा की मदद कर सकती हूँ?"
उसे यह ख्याल डरावना भी लगा और उत्तेजक (Exciting) भी। 'क्या मैं पापा की बीवी बनकर उस पार्टी में जा सकती हूँ? सिर्फ एक रात के लिए... सिर्फ एक नाटक? आखिर पापा की इज्जत और नौकरी का सवाल है। अगर मैं अच्छी तरह तैयार हो जाऊँ, वो बोल्ड ड्रेस पहनूँ और मेकअप करूँ, तो कोई पहचान भी नहीं पाएगा।'
उसे वह 'इस्कॉर्ट' शब्द याद आया तो घृणा हुई। वह नहीं चाहती थी कि कोई बाहरी औरत उसके पापा के करीब आए या उनका हाथ पकड़े। उसे लगा कि यह उसका फर्ज है कि वह अपने पिता को बचाए।
वह दबे पांव रवि के कमरे की ओर बढ़ी। उसने देखा कि रवि सोफे पर निढाल पड़ा है, उसकी शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले हैं और वह पसीने में तर है।
स्नेहा (मन ही मन): । क्या पापा मानेंगे? क्या उन्हें लगेगा कि मैं अब सच में बड़ी हो गई हूँ?"
कमरे की हवा में शराब और सस्पेंस का मिला-जुला नशा था। स्नेहा ने एक गहरी सांस ली और धीरे से दरवाजा खटखटाया। रवि ने आँखें खोलीं, उसकी नजरों में एक ऐसी चमक थी जिसे स्नेहा समझ नहीं पाई—वह एक शिकारी की जीत की चमक थी।
स्नेहा: "पापा... आप ठीक तो हैं ना?"
रवि हड़बड़ा गया। उसने लड़खड़ाते हुए शराब की बोतलें पीछे छिपाईं, उसके चेहरे पर पसीना था और आँखें लाल थीं।
रवि: "स्नेहा? तुम यहाँ... ये सब मत देखो बेटा, मैं... मैं बस थोड़ा टेंशन में हूँ। जाओ तुम।"
स्नेहा: "पापा, अब रहने दीजिए। मुझे सब पता है। आप ki aap tension me sharaab pi rahe hain मुझे बताइए न, आखिर बात क्या है?"
रवि ने एक लंबी सांस ली और टूटते हुए लहजे में वही पार्टी और प्रमोशन वाली कहानी दोहराई। उसने जताया कि शांति (मम्मी) का अड़ियल रवैया उसकी नौकरी ले डूबेगा।
स्नेहा: "पापा, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मम्मी की जगह कोई और चला जाए? क्या वहाँ कोई उन्हें पहचानता है?"
रवि: "नहीं... पहचानता तो कोई नहीं है। पर और कौन जाएगा बेटा?।"
स्नेहा ने एक गहरी सांस ली। उसका दिल जोरों से धड़क रहा था।
स्नेहा: "पापा... अगर मैं चलूँ तो? मैं एक रात के लिए आपकी 'वाइफ' बनकर एक्टिंग कर सकती हूँ।"
रवि ने चौंककर उसकी ओर देखा। उसकी नजरों में हैरानी और 'डर' का एक मिला-जुला नाटक था।
रवि: "क्या? तुम? नहीं स्नेहा... तुम समझ नहीं रही हो। वहाँ का माहौल, वहाँ के लोग... वो बहुत अलग हैं। और तुम्हारी सीमाएं, तुम्हारे संस्कार... वो तुम्हें इजाजत नहीं देंगे। मुझे अपनी बेटी को उस माहौल में ले जाते हुए अच्छा नहीं लगेगा।"
स्नेहा: (जिद के साथ) "उफ़ पापा! आप ओवर-एक्ट कर रहे हैं। मैं वैसी ड्रेसेस नहीं पहनती, ठीक है, पर एक रात के लिए मैं एडजस्ट कर सकती हूँ। आप बस बताइए करना क्या है। मैं आपको ऐसे मरते हुए नहीं देख सकती।"
रवि चुप हो गया। उसने अपनी नजरें स्नेहा के चेहरे पर टिका दीं। कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि स्नेहा को अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी। रवि धीरे से उठा और अपने फोन की गैलरी खोलने लगा।
रवि: (धीमी और मखमली आवाज़ में) "ठीक है... अगर तुम इतनी ही जिद कर रही हो और खुद को बड़ा समझती हो, तो देखो। वहाँ की पार्टीज ऐसी होती हैं। ये विदेशी लोग हैं, यहाँ का पहनावा, यहाँ का ढंग... ये सब बस एक ट्रेलर है। मुझे गलत मत समझना, पर तुम्हें समझना होगा कि wo bahut high class log hain।"
रवि ने अपना फोन स्नेहा की ओर बढ़ाया। फोन की स्क्रीन पर कुछ विदेशी पार्टियों की फोटोज और वीडियोज थे—जहाँ औरतें बेहद रिवीलिंग गाउन्स में थीं, पुरुषों के करीब होकर डांस कर रही थीं और माहौल पूरी तरह 'सेंसुअल' था।
स्नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने कभी ऐसी दुनिया नहीं देखी थी।
यह दृश्य रवि की शातिर प्लैनिंग और स्नेहा के मानसिक समर्पण का चरम बिंदु है। रवि ने बड़ी ही चतुराई से 'मजबूरी' और 'आधुनिकता' का ऐसा कॉकटेल बनाया कि स्नेहा को सब कुछ जायज लगने लगा।
दृश्य: धुंधला सच और नई पहचान
रवि ने अपने फोन में पहले से ही कुछ 'विशिष्ट' तस्वीरें सहेज रखी थीं, लेकिन उसने स्नेहा के सामने ऐसा नाटक किया जैसे वह घबराहट में कुछ ढूंढ रहा हो। फिर अचानक उसने स्क्रीन स्नेहा की तरफ घुमा दी।
स्नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं। स्क्रीन पर धुंधली लेकिन उत्तेजक तस्वीरें थीं—स्विमिंग पूल के किनारे बिकिनी में महिलाएं, छोटे और पारदर्शी कपड़ों में नाचते जोड़े, और हाथों में जाम
स्नेहा: (झटके से) "छि! पापा... ये कैसी गंदी पार्टीज हैं? इन लोगों ने तो कुछ पहना ही नहीं है। ये क्या बकवास है?"
रवि: (डांटते हुए, जैसे कोई गहरी बात समझा रहा हो) "पहना क्यों नहीं है स्नेहा? pool parties me bikini nahi to kya salwar kurta pahnenge?। Ye baat to sneha ko bhi thik lagi ki haan paapa kah to sahi rahe hain.। उनके लिए ये सब नॉर्मल है, जैसे तुम्हारे लिए कुर्ती-जींस। और रही बात इन हरकतों की... तो वहां सब नशे में रहते हैं, सुबह तक किसी को कुछ याद नहीं रहता। वैसे भी वहां फोटोग्राफी मना है.
उसने तस्वीरें इतनी जल्दी-जल्दी स्वाइप कीं कि स्नेहा को बारीकी से देखने का मौका ही न मिले, बस उसके दिमाग पर उन 'बोल्ड' कपड़ों का एक गहरा असर हो जाए।
रवि: "तुम छोड़ो बेटा... तुम नहीं समझोगी। मैं भी नशे में हूँ, पता नहीं क्या बोल रहा हूँ। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। पता नहीं मेरा क्या होगा..."
स्नेहा के अंदर एक आग सी जल उठी। उसे लगा कि उसके पिता एक ऐसी दुनिया के शिकार हो रहे हैं जहाँ वो अकेले नहीं टिक पाएंगे। ऊपर से मम्मी का अड़ियल रवैया... उसे लगा कि अगर उसने मदद नहीं की, तो पापा वाकई कुछ गलत (सुसाइड) कर लेंगे या किसी अनजान 'भाड़े की लड़की' को लाकर घर की इज्जत मिट्टी में मिला देंगे।
स्नेहा: (हिम्मत जुटाकर) "पापा... मैं आपके साथ चलूँगी। आपने ही कहा न कि वहां कोई किसी को पहचानता नहीं है? और जब फोटोग्राफी भी नहीं है, तो किसी को पता कैसे चलेगा? मैं आपकी 'वाइफ' बनकर वहां जा सकती हूँ।"
रवि ने एक गहरी और कुटिल सांस ली। उसने स्नेहा को ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे वह उसकी 'योग्यता' परख रहा हो।
रवि: "बेटा... तुम कर तो लोगी, पर वहां के तौर-तरीके? तुम तो नाइटी देखकर शर्मा रही थी, और वहां तो हाई-क्लास पार्टी के हिसाब से रहना होगा। तुम खुद को देखो... तुम कुर्ती-जींस से बाहर ही नहीं आई हो। तुम वहां एडजस्ट नहीं कर पाओगी।"
स्नेहा को अपनी 'संस्कारी' इमेज पर पहली बार गुस्सा आया। उसे लगा कि पापा उसे अभी भी वही छोटी बच्ची समझ रहे हैं जो कुछ नहीं कर सकती।
स्नेहा: "उफ़ पापा! आप बार-बार मुझे वही ताना क्यों दे रहे हैं? मैं एडजस्ट करूँगी। मैं वो कपड़े भी पहनूँगी जो उस पार्टी के लिए जरूरी हैं। बस एक रात की तो बात है। किसी को पता नहीं चलेगा और आपका काम भी हो जाएगा।"
दृश्य: तर्कों की दीवार और रवि का जाल
स्नेहा कमरे में इधर-उधर टहल रही है, उसका दिमाग तेज़ी से चल रहा है। वह किसी भी तरह इस स्थिति से बचना चाहती है, लेकिन पापा की नौकरी भी बचाना चाहती है।
स्नेहा: "पापा, एक रास्ता है! आप पार्टी में जाइए ही मत। आप बॉस को बोल दीजिए कि आपकी तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है। या फिर कह दीजिए कि मम्मी बीमार हैं, आप उन्हें छोड़कर नहीं आ सकते। कोई मेडिकल सर्टिफिकेट का बहाना बना देंगे।"
रवि: (कड़वाहट भरी हंसी के साथ) "बेटा, तुम अभी कॉर्पोरेट दुनिया को नहीं जानती। जिस कंपनी में मैं काम करता हूँ, वहाँ बीमार होने का मतलब है कंपनी के पैनल वाले डॉक्टर से जांच करवाना। अगर मैं कल बीमार होने का नाटक करूँ और अगले दिन ऑफिस में तंदुरुस्त दिखूँ, तो मेरा झूठ पकड़ा जाएगा। और रही बात मम्मी की, तो बॉस सीधे कह देगा—'राज, अपनी बीवी को आराम करने दो, तुम अकेले आ जाओ।' पर यहाँ शर्त ही ये है कि फैमिली के साथ आना है। मैं बच नहीं सकता।"
स्नेहा: (हार न मानते हुए) "तो पापा... आप कह दीजिए कि घर में कोई बहुत बड़ी इमरजेंसी हो गई है। किसी रिश्तेदार की शादी है या... या फिर कह दीजिए कि गाँव में किसी की डेथ हो गई है और आपको अर्जेंटली जाना पड़ रहा है।"
रवि ने सिगरेट का धुआं छोड़ा और स्नेहा की आँखों में झांका, जैसे उसकी नासमझी पर तरस खा रहा हो।
रवि: "स्नेहा, मैं आज कैसे कह दूँ कि एक हफ्ते बाद किसी की डेथ होने वाली है? पार्टी की डेट फिक्स है। और शादी? अगर मैं कहूँ कि किसी दूर के रिश्तेदार की शादी है, तो बॉस सोचेगा कि मेरे लिए उसके करोड़ों के प्रोजेक्ट की पार्टी से ज्यादा जरूरी किसी की शादी में नाचना है। वो इसे मेरा 'एटीट्यूड' समझेगा। और शादी का कार्ड? वो लोग सबूत मांगते हैं बेटा। इतना बड़ा झूठ बोलना और फिर उसे याद रखना... मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है। एक छोटा सा झूठ पकड़ा गया तो मेरी सालों की साख मिट्टी में मिल जाएगी।"
स्नेहा चुप हो गई। उसे अहसास हुआ कि पापा जो कह रहे हैं, उसमें लॉजिक है।
स्नेहा: "तो पापा... अगर आपकी 'बीवी' बनकर कोई और जाए... मतलब, कोई और औरत... तो क्या उन्हें शक नहीं होगा?"
रवि: (गहरी सांस लेते हुए) "शक का खतरा तो है, लेकिन इस केस में रिस्क कम है। क्यों? क्योंकि मेरी बीवी को ऑफिस में किसी ने नहीं देखा। मैं जिसे भी साथ लेकर जाऊंगा और 'मिसेज राज' कहकर इंट्रोड्यूस कराऊंगा, लोग उसी को सच मानेंगे। जब तक कि भेद न खुले, तब तक सब सुरक्षित है।"
रवि ने अपनी बात का वजन बढ़ाते हुए आगे कहा, "लेकिन बात सिर्फ जाने की नहीं है स्नेहा। वहाँ का माहौल, वहां का पहनावा... मैंने तुम्हें दिखाया न? आधे से ज्यादा लोग फॉरेन क्लाइंट्स होंगे। उनके लिए ये ड्रेसेस आम बात हैं। वहां कोई ये नहीं सोचेगा कि तुमने क्या पहना है, बल्कि ये देखेंगे कि तुम कितनी 'कॉन्फिडेंट' दिख रही हो।"
स्नेहा के पास अब कोई तर्क नहीं बचा था। उसे समझ आ गया कि पापा की नौकरी बचाने का सिर्फ एक ही रास्ता है, और वह रास्ता उस 'बोल्ड' दुनिया से होकर गुजरता है जिसे उसने अभी तक सिर्फ तस्वीरों में देखा था।
रवि: "खैर, तुम ये सब छोड़ो। तुम बच्ची हो, तुम ये रिस्क मत लो।
रवि ने एक गहरी सांस ली और जानबूझकर अपनी नजरें स्नेहा से हटा लीं। वह अपनी मेज पर रखे कागजों को ऐसे टटोलने लगा जैसे उसे अब स्नेहा की बात में कोई दिलचस्पी न हो।
रवि: (रूखी आवाज़ में) "बेटा, तुम बात को समझ ही नहीं रही हो। शर्म और झिझक उन लोगों के लिए है जिनके पास खोने को कुछ न हो। मेरी यहाँ जान पर बनी है, नौकरी दांव पर है, और तुम्हें अभी भी ये लग रहा है कि मैं तुम्हें देखूँगा? अरे, मेरा पूरा ध्यान वहां अपने सीनियर्स को इम्प्रेस करने और बॉस के सामने खुद को साबित करने में होगा। मैं वहां काम के बोझ और टेंशन में इतना डूबा रहूँगा कि मुझे ये होश भी नहीं रहेगा कि बगल में खड़ा कौन है। तुम वहां सिर्फ एक 'सपोर्ट सिस्टम' बनकर चलोगी, कोई सजावट की वस्तु नहीं।"
स्नेहा को यह लॉजिक एकदम सही लगा। उसे लगा कि वह कितनी स्वार्थी है जो पापा के इतने बड़े संकट के बीच अपनी छोटी सी शर्म को लेकर बैठी है।
रवि: (उकसाते हुए) "वैसे भी, तुम पुरानी सोच वाली लड़की हो। इतनी जल्दी हाई-सोसाइटी में एडजस्ट करना तुम्हारे बस की बात नहीं है। तुम छोड़ो ये सब... बेकार में हम टाइम वेस्ट कर रहे हैं। तुम जाओ, अपनी पढ़ाई करो। मैं अपनी किस्मत खुद झेल लूँगो।"
रवि ने जैसे ही उसे जाने का इशारा किया, स्नेहा वहीं जमी रही। वह पापा को इस तरह हारते हुए नहीं देख सकती थी। तभी रवि अचानक उठा और उसने स्नेहा को एक बेहद इमोशनल और गर्मजोशी भरे गले (Hug) से लगा लिया।
रवि: (भारी आवाज़ में) "बेटा, मैं जानता हूँ तुम मेरा भला चाहती हो। इस घर में सिर्फ एक तुम ही हो जो मुझे समझती हो, वरना तुम्हारी मम्मी ने तो मुझे कब का पराया कर दिया है। तुमने मेरे लिए इतना सोचा, यही मेरे लिए बहुत है। मैं इसी के सहारे जी लूँगा। मेरी फिक्र मत करो, मैं देख लूँगो... चाहे जो भी हो, मैं तुम लोगों की जिम्मेदारी आखिरी दम तक उठाऊँगा।"
रवि की बाहों की गिरफ्त और उसके 'टूटे हुए' अल्फाजों ने स्नेहा के दिल को पूरी तरह पिघला दिया। उसे लगा कि उसके पिता उसके लिए अपनी जान तक देने को तैयार हैं, और वह एक मामूली ड्रेस नहीं पहन सकती?
स्नेहा: (दृढ़ता के साथ) "पापा! बस... बहुत हो गया। अब मैंने अपना मन बना लिया है। मैं आपके साथ पार्टी में चल रही हूँ, और अब मैं एक शब्द भी नहीं सुनूँगी!"
रवि: (धीरे से उसे खुद से अलग करते हुए) "बेटा, रहने दो... तुम रहने दो। तुम अभी उन कपड़ों के नाम से झिझक रही थी। वो सब पहनना तुम्हारे लिए मुमकिन नहीं होगा।"
स्नेहा: "पापा, आप देखिए अब मैं क्या करती हूँ! आप बस मुझे बताइए कि वो बैग कहाँ है और वो कपड़े कहाँ रखे हैं? आज से आप कोई टेंशन नहीं लेंगे, न शराब पिएंगे और न सुसाइड की बात करेंगे। हम साथ मिलकर ये काम निपटाएंगे। आप बस मुझ पर भरोसा रखिए।"
रवि ने एक लंबा मौन साधा। उसके चेहरे पर उदासी थी, लेकिन अंदर एक शैतानी सिहरन दौड़ रही थी। उसने कांपते हाथ से अलमारी के पास रखे उस काले बैग की तरफ इशारा कर दिया।रवि: "वो रहा... पर स्नेहा, सोच लो...
स्नेहा ने बैग की चेन धीरे से खोली। उसकी उंगलियां उन कपड़ों को छूते ही सिहर उठीं। उसने एक-एक करके उन गाउन्स को बाहर निकाला जिन्हें रवि ने बड़ी ही चालाकी से तह करके रखा था। गाउन्स का कपड़ा इतना महीन और मखमली था कि स्नेहा की हथेलियों पर फिसल रहा था।
एक पल के लिए वह रुकी। उसकी नजर एक गहरे काले रंग के 'रिवीलिंग' गाउन पर ठिठक गई। इसका गला काफी गहरा था और कमर के पास से बड़े कट्स थे। उसने उन वीडियोज को याद किया जो पापा ने दिखाए थे। उसके दिमाग ने तर्क दिया— 'वीडियो में तो लड़कियां इससे कहीं ज्यादा बोल्ड कपड़े पहने थीं... उनके मुकाबले तो ये कुछ भी नहीं है।' उसने अपना डर झटक दिया। उसे लगा कि अब सवाल-जवाब करने से कोई फायदा नहीं, बस कर गुजरना है।
कमरे का सन्नाटा अब भारी होने लगा था। स्नेहा ने दरवाजा अंदर से बंद किया। उसने अपने सूती कपड़ों को उतारकर उस ठंडे, रेशमी गाउन को अपने शरीर पर चढ़ाया। साटन का वो कपड़ा उसकी जवान त्वचा से लिपट गया। जब उसने आईने में खुद को देखा, तो उसे खुद अपनी पहचान पर यकीन नहीं हुआ। गाउन का सामने वाला हिस्सा उसकी छाती के उभारों को पूरी तरह नहीं ढंक पा रहा था, और उसकी पीठ लगभग पूरी नंगी थी। उसने अपने बिखरे बालों को गर्दन के एक तरफ किया, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन और साफ रंगत और भी निखर उठी।
उधर बाहर कमरे में, रवि अपनी कुर्सी पर बेधड़क बैठा था। कमरे में सिर्फ उसकी भारी सांसों की आवाज थी। अचानक दरवाजे की कुंडी खुली।
रवि ने अपनी नजरें उठाईं। सामने स्नेहा खड़ी थी।
वह 'बेटी' अब कहीं पीछे छूट गई थी। उस पारदर्शी और बेहद कम कपड़ों वाले लिबास में स्नेहा किसी अप्सरा की तरह लग रही थी, लेकिन उसकी आंखों में अभी भी वह मासूम झिझक थी जो उसे और भी आकर्षक बना रही थी। गाउन की पतली डोरियां उसके कंधों पर टिकी थीं, जो उसकी कोमल त्वचा पर लाल निशान छोड़ रही थीं।
रवि की सांसें अटक गईं। उसने कभी नहीं सोचा था कि स्नेहा उस बोल्ड ड्रेस में इतनी 'सेंसुअस' और 'बड़ी' दिखेगी। उसके गले के पास से दिखती स्नेहा की धड़कनें बता रही थीं कि वह कितनी घबराई हुई है, लेकिन वह रवि की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही थी।
रवि ने एक गहरा कश भरा और अपनी कुर्सी से धीरे से उठा। उसकी नजरें स्नेहा के उन हिस्सों पर जमी थीं जिन्हें वह साटन का कपड़ा ढंकने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
रवि को तो उसने देख के बिल्कुल मज़ा ही आ गया लेकिन उसने अपने चेहरे पर भाव-भाव से प्रकट नहीं होने दिया। वो उसके नंगे कंधे और नंगी टांगें देख के तो बहुत एक्साइटेड हो चुका था। उसने एक लंबी गहरी सांस ली और बोले कि मतलब तुम नहीं मानोगी। स्नेहा ने गर्दन हिला कर बोला कि नहीं तो रवि बोला ठीक है, देखते हैं कि तुम कहाँ तक टिक पाती हो। देखो बाकी ड्रेस ट्राई करो क्या तुम्हें इतनी हिम्मत है? ठीक है ट्राई करो। और इसके बाद स्नेहा एक-एक स्नेहा एक-एक करके अपनी ड्रेसेस से करके सामने बहुत थोहड़ी-बहुत झिझकती तो थी लेकिन वो एक-एक करके ड्रेस पहनकर रवि के सामने आने लगी
स्नेहा एक-एक करके कपड़े बदल रही थी। हर नई ड्रेस के साथ उसकी झिझक की परतें थोड़ी कम हो रही थीं, लेकिन रवि का चेहरा अभी भी पत्थर की तरह सख्त था। जब स्नेहा ने घुटनों से काफी ऊपर वाली एक छोटी ड्रेस पहनी, जिसमें उसकी जांघों का काफी हिस्सा नुमाया हो रहा था, तो उसने रवि की आंखों में कोई सराहना नहीं देखी। रवि बस एक ठंडी और बेरुखी भरी "हूँ" कहकर अपनी नजरें फेर लेता।
रवि की इस बेरुखी ने स्नेहा को और भी बेचैन कर दिया। उसे लगा कि शायद वह अभी भी उस 'हाई-सोसाइटी' लुक के काबिल नहीं लग रही है। वह वापस कमरे में गई और अब उसके हाथ उस ड्रेस पर पड़े जो बैग की सबसे गहराई में थी—एक गहरे लाल रंग की साटन की स्ट्रैपलेस ड्रेस, जो इतनी छोटी और महीन थी कि उसे हाथ में पकड़ते ही स्नेहा का कलेजा मुंह को आ गया।
स्नेहा ने उसे पहना, लेकिन डर के मारे उसने अपनी ब्रा अंदर ही रहने दी। जब वह आईने के सामने खड़ी हुई, तो उसने देखा कि ड्रेस की गहरी नेकलाइन से उसकी ब्रा के स्ट्रैप्स और किनारे साफ झलक रहे थे। उसकी नंगी टांगें और सुडौल बाहें पूरी तरह खुली थीं। वह कांपते कदमों से बाहर आई।
दृश्य:
रवि अपनी जगह पर वैसे ही बैठा था, लेकिन जैसे ही स्नेहा कमरे में आई, उसकी आंखों में पहली बार एक तीखी चमक कौंधी। कमरे की मद्धम रोशनी में स्नेहा के शरीर की गोराहट उस लाल साटन में दमक रही थी।
रवि ने उसे सिर से पैर तक स्कैन किया। उसकी नजरें स्नेहा की जांघों से होते हुए उसकी छाती पर रुकीं, जहाँ ब्रा का किनारा साफ दिख रहा था। उसने एक कड़वा घूँट भरा और अपनी आवाज़ को थोड़ा और गहरा किया।
रवि: (कठोर लहजे में) "स्नेहा... मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि यह कोई मोहल्ले की पार्टी नहीं है। वहां के लोग पारखी नजर वाले होते हैं। उस दुनिया में अगर तुम अपनी ड्रेस के अंदर ये सब (ब्रा की तरफ इशारा करते हुए) पहनोगी, तो तुम वहां 'मॉडर्न' नहीं, बल्कि 'देहाती' लगोगी। वह ड्रेस अपना आकार नहीं ले पा रही क्योंकि तुमने नीचे बेमतलब की परतें चढ़ा रखी हैं।"
स्नेहा के गाल शर्म से लाल हो गए। वह अपनी उंगलियों से ड्रेस के किनारों को खींचकर खुद को ढकने की कोशिश करने लगी। उसके पिता के सामने उसकी अंतःवस्त्रों (innerwear) का ज़िक्र होना उसे अंदर तक सिहरा गया।
स्नेहा: (हकलाते हुए) "प..पापा, वो... इसके बिना मुझे बहुत डर लग रहा है। ये ड्रेस बहुत पतली है।"
रवि धीरे से उठा और स्नेहा के इतना करीब आ गया कि उसके परफ्यूम की तीखी गंध स्नेहा की सांसों में घुलने लगी। उसने स्नेहा की बांह पर अपना हाथ रखा—स्पर्श इतना गर्म था कि स्नेहा की पूरी रीढ़ में एक बिजली सी दौड़ गई।
रवि: "डर को बाहर छोड़ना होगा स्नेहा। अगर तुम्हें वहां मेरी 'शान' बनकर खड़ा होना है, तो तुम्हें इस ड्रेस को वैसे ही पहनना होगा जैसे इसे पहनने का रिवाज है। Baaki tumhari marji, mujhe tumhe force nahi karna.
रवि की नजरों का दबाव और उसका वह 'अड़ियल' रवैया स्नेहा को मजबूर कर रहा था। उसे अहसास हुआ कि अब पीछे हटने का मतलब है पापा का अपमान। उसने एक गहरी और भारी सांस ली और बिना कुछ बोले वापस कमरे की ओर मुड़ गई। उसे पता था कि अगली बार जब वह बाहर आएगी, तो उसके शरीर और उस लाल साटन के बीच कोई पर्दा नहीं होगा।
पीछे खड़ा रवि उसे जाते हुए देख रहा था। उसके चेहरे पर अब एक विजयी और हवस भरी मुस्कान थी। वह जानता था कि उसने स्नेहा की 'शर्म' की ek aur दीवार भी गिरा दी है।
कमरे के भीतर सन्नाटा इतना गहरा था कि स्नेहा को अपनी ही तेज़ धड़कनों का शोर सुनाई दे रहा था। उसने कांपते हाथों से अपनी ब्रा के स्ट्रैप्स को कंधे से नीचे गिराया और उस साटन की ड्रेस को सीधे अपनी नंगी त्वचा पर महसूस किया। बिना किसी सहारे के, वह पतला कपड़ा उसके जिस्म की बनावट को बेबाकी से उभार रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह पूरी तरह निर्वस्त्र है।
जब वह कमरे से बाहर आई, तो शर्म के मारे उसका बुरा हाल था। उसने अपने दोनों हाथों को अपनी छाती पर कसकर क्रॉस कर लिया था (सिकुड़ कर), ताकि वह गहरी नेकलाइन पापा की नज़रों से बची रहे। उसकी झुकी हुई गर्दन और थरथराते पैर उसकी बेचैनी की गवाही दे रहे थे।
रवि ने सोफे पर बैठे-बैठे उसे एक तिरछी नज़र से देखा और फिर हताशा में अपनी गर्दन दूसरी तरफ घुमा ली।
रवि: (ठंडी और नीरस आवाज़ में) "फर्क ही क्या पड़ता है स्नेहा? तुम अगर पूरी पार्टी में ऐसे ही हाथ बांधकर और सिकुड़कर खड़ी रहोगी, तो सबको पता चल जाएगा कि तुम कोई 'हाई-सोसाइटी' लेडी नहीं, बल्कि एक डरी हुई बच्ची हो। ठीक है बेटा... मत करो। तुमने इतना किया मेरे लिए वही बहुत है। मुझे पता है तुम मुझसे प्यार करती हो, पर शायद मेरी किस्मत में ही हार लिखी है।"
रवि के उन 'हारे हुए' शब्दों ने स्नेहा के भीतर एक अजीब सा विद्रोह पैदा कर दिया। उसे लगा कि उसकी झिझक उसके पिता के वजूद को मिटा रही है। एक पल के लिए उसने अपनी आँखें बंद कीं, एक गहरी सांस ली और अचानक... उसने अपनी छाती पर बंधे हुए अपने दोनों हाथ खोल दिए।
जैसे ही उसने हाथ हटाए, वह गहरा गला (Neckline) पूरी तरह खुल गया। उस मखमली साटन के बीच से स्नेहा का गोरा और उभरा हुआ सीना रवि की नज़रों के ठीक सामने था। कमरे की मद्धम पीली रोशनी में उसके बदन की चमक और उस ड्रेस की बोल्डनेस ने पूरे माहौल को जैसे थाम दिया।
रवि की आँखों में एक ऐसी चमक कौंधी जिसे वह लाख कोशिशों के बाद भी नहीं छिपा सका। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसने कभी नहीं सोचा था कि वह अपनी सीधी-सादी बेटी को इस रूप में देख पाएगा—इतनी बेबाक, इतनी 'रिवीलिंग' और इतनी मादक। वह गाउन इतना ज्यादा 'बोल्ड' था कि कोई फिल्म एक्ट्रेस भी कैमरे के सामने उसे पहनने से पहले सौ बार सोचे।
रवि को लगा जैसे उसका कोई बरसों पुराना सपना सच हो गया हो। उसकी नज़रें स्नेहा के उन खुले हुए हिस्सों पर जम गईं जहाँ से साटन का कपड़ा फिसल रहा था। स्नेहा वहाँ बुत बनी खड़ी थी, उसका पूरा शरीर सिहर रहा था, लेकिन उसने अपनी नज़रें झुकाई नहीं। उसे अहसास हो रहा था कि उसकी इस 'बेबाकी' ने उसके पिता के चेहरे पर एक नई जान फूँक दी है।
रवि धीरे से अपनी जगह से उठा, उसकी सांसें अब भारी थीं। वह स्नेहा के इतने करीब आया कि उनके बीच केवल एक इंच का फासला बचा।
रवि की योजना बिल्कुल वैसी ही चल रही थी जैसी उसने सोची थी। उसने स्नेहा को विश्वास दिला दिया था कि उसकी नजरें 'हवस' की नहीं, बल्कि एक 'परखने वाले' की हैं। स्नेहा को लगा कि उसके पापा उसे एक बेटी की तरह नहीं, बल्कि एक मिशन के साथी की तरह देख रहे हैं। यही वह 'सुरक्षा' का अहसास था जिसने स्नेहा की शर्म की आखिरी दीवार भी गिरा दी।
दृश्य: पूर्ण समर्पण और बेबाक प्रदर्शन
जब रवि ने उसे दोबारा अंदर भेजा, तो स्नेहा को एक पल के लिए धक्का लगा। उसे लगा था कि वह लाल ड्रेस आखिरी इम्तिहान है, लेकिन रवि का "देखते हैं तुम कहाँ तक कर पाती हो" कहना उसे चुनौती दे गया। स्नेहा अब पीछे नहीं हटना चाहती थी; उसे लगा कि अगर वह अब रुकी, तो पापा फिर से उसी उदासी के अंधेरे में चले जाएंगे।
स्नेहा का बढ़ता आत्मविश्वास:उसने कमरे में जाकर आईना देखा। उसे महसूस हुआ कि उसके पापा के सामने उसे कोई खतरा नहीं है। बाहर की दुनिया में अगर कोई उसे ऐसे देखता, तो वह डर जाती, लेकिन यहाँ उसके 'रक्षक' पिता खड़े थे। इसी भरोसे ने उसे पूरी तरह 'फ्री' कर दिया।
नया लिबास: उसने अब एक गाउन निकाला, जो पहले वाले से भी ज्यादा खतरनाक था। इसमें कमर के दोनों तरफ बड़े कट्स थे और पीठ पूरी तरह से खुली थी।
परिवर्तन: स्नेहा ने अब झिझकना बंद कर दिया था। उसने बालों को ऊपर एक जूड़े में बांधा ताकि उसकी गर्दन और पीठ पूरी तरह साफ दिखें।
रवि के सामने प्रदर्शन:जब वह कमरे से बाहर आई, तो उसकी चाल में एक नई खनक थी। वह अब सिकुड़कर नहीं, बल्कि सीना तानकर चल रही थी। रवि सोफे पर बैठा था, उसके हाथ में अभी भी वही गिलास था, लेकिन उसकी आँखों में जो 'हवाइयाँ' उड़ रही थीं, उन्हें वह बड़ी मुश्किल से छिपा पा रहा था।
स्नेहा उसके सामने आकर रुकी और एक 'मॉडल' की तरह घूमी ताकि रवि उसकी पीठ और गाउन के कट्स देख सके।
रवि: (गले में अटकी आवाज़ को साफ करते हुए) "हूँ... यह बेहतर है। इसकी फिटिंग भी सही है। पर स्नेहा, तुम्हें वहां लोगों से बात भी करनी होगी, सिर्फ खड़ा नहीं रहना है।"
रवि जानबूझकर बहुत ही 'प्रोफेशनल' बनने का नाटक कर रहा था, ताकि स्नेहा का भरोसा बना रहे। लेकिन हकीकत यह थी कि स्नेहा का खिलता हुआ यौवन और उस पारदर्शी लिबास में उसकी झलक देखकर रवि का अंदरूनी शैतान जाग चुका था। वह मन ही मन दंग था कि उसकी मासूम बेटी इतनी 'सेंसुअस' और 'बोल्ड' हो सकती है।
स्नेहा अब एक के बाद एक ड्रेस बदल रही थी। कभी कोई हाई-स्लिट गाउन जिसमें उसकी पूरी टांग ऊपर तक दिखती, तो कभी कोई ऐसी ड्रेस जो सिर्फ डोरियों के सहारे टिकी थी।
स्नेहा: "पापा, यह वाली कैसी है? क्या यह ज्यादा तो नहीं हो रही?"
रवि ने उसे गौर से देखा। स्नेहा के शरीर की गोराहट और उन बोल्ड ड्रेसेस के कट्स एक जानलेवा कॉम्बिनेशन बना रहे थे।
रवि: "नहीं... यह ठीक है। बस थोड़ा और कॉन्फिडेंस दिखाओ। तुम्हें वहां मेरी 'वाइफ' की तरह व्यवहार करना है, याद है ना? हाथ पकड़ना, साथ चलना... ये सब नेचुरल लगना चाहिए।"
स्नेहा मुस्कुरा दी। उसे लगा कि वह अपने पापा की उम्मीदों पर खरी उतर रही है। उसे अंदाजा भी नहीं था कि रवि का हर शब्द उसे एक ऐसे जाल में और अंदर खींच रहा है, जहाँ से बाहर निकलने का रास्ता अब बंद हो चुका था। वह बेखौफ होकर अपने जिस्म की नुमाइश कर रही थी, यह सोचकर कि वह सुरक्षित है, जबकि रवि की नजरें उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को अपनी याददाश्त में कैद कर रही थीं।
कमरे की फिजा अब पूरी तरह बदल चुकी थी। हवा में सस्पेंस, पसीना और एक अनजानी सी उत्तेजना घुली हुई थी। स्नेहा ने जब वह आखिरी ड्रेस पहनी, तो वह खुद आईने के सामने ठिठक गई। वह गाउन नहीं, बल्कि साटन की कुछ कतरनें थीं जो बस शरीर पर झूल रही थीं। उसकी गहरी नेकलाइन से उसके उभरे हुए वक्ष (breasts) आधे से ज्यादा नुमाया हो रहे थे। गाउन का कट इतना ऊंचा था कि उसकी गोरी, मखमली जांघें पूरी तरह से खुली थीं।
जब वह बाहर आई, तो रवि की हालत खराब हो गई। उसने अपनी सूखी हुई जीभ को धीरे से अपने होठों पर फिराया। उसका दिल सीने में हथौड़े की तरह बज रहा था। वह चाह रहा था कि स्नेहा बस थोड़ा सा झुके या सोफे पर बैठे, ताकि वह उस ऊंचे कट की गहराई तक देख सके। उसकी जांघों की चिकनाहट और उस रिवीलिंग गाउन में उसकी बेबाकी ने रवि के सब्र का बांध तोड़ दिया था।
रवि: (भारी और दबी हुई आवाज़ में) "चलो... शुरुआत तो तुमने ठीक की है। कॉन्फिडेंस आ रहा है तुममें। पर अभी भी इसमें कुछ कमी है।"
स्नेहा ने अपनी नजरें नीची कर लीं। वह खुद को उस गाउन में देखकर हैरान थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसका फिगर इतना मादक और 'परफेक्ट' हो सकता है। वह किसी फिल्मी हीरोइन से कम नहीं लग रही थी।
स्नेहा: (झिझकते हुए) "पापा, क्या ये कुछ ज्यादा नहीं है? मैं सबके सामने कैसे..."
रवि: (उसे टोकते हुए) "यही तो बात है स्नेहा। वहां सब तुम्हें देखेंगे, पर तुम्हें ऐसा प्रिटेंड करना है जैसे तुम्हें फर्क नहीं पड़ता। खैर, अभी मम्मी के आने का वक्त हो रहा है, इसलिए हम मेकअप और सैंडल्स वाला पार्ट बाद में करेंगे। अभी तुम बस फटाफट बाकी ड्रेसेस भी दिखा दो। मैं देखना चाहता हूँ कि तुम हर स्टाइल में कितनी 'कम्फर्टेबल' हो।"
रवि चाहता था कि स्नेहा इस वक्त जिस 'फ्लो' और 'मूड' में है, वह पूरी तरह से खुल जाए। उसे पता था कि एक बार स्नेहा ने खुद को इस रूप में स्वीकार कर लिया, तो फिर वह उसे जैसा चाहे वैसा ढाल सकेगा।
स्नेहा अब एक मशीन की तरह हो गई थी। उसका डर अब एक अजीब से नशे में बदल चुका था। वह अंदर जाती और एक के बाद एक ऐसी ड्रेसेस पहनकर बाहर आती जो शरीर को ढकने के बजाय उसे और उभारती थीं।
कभी वह सिमरी सिल्वर ड्रेस में आती जिसका गला इतना गहरा था कि सांस लेते वक्त भी वह खिसक जाता, तो कभी वह बैकलेस रेड गाउन में आती जो सिर्फ पतली डोरियों के सहारे उसकी पीठ पर टिका था। स्नेहा अब रवि के सामने रुककर मुड़ती, अपनी देह का प्रदर्शन करती और रवि की आँखों में चढ़ते हुए उस 'सुरूर' को महसूस करती।
रवि सोफे पर धंसा हुआ, अपनी आँखों से स्नेहा के बदन को जैसे पी रहा था। वह हर बार बस एक छोटा सा सुझाव देता— "थोड़ा और सीधा खड़ी हो," या "ड्रेस को ऊपर से थोड़ा ठीक करो," ताकि स्नेहा उन नाजुक हिस्सों को छुए और रवि का आनंद बढ़ता रहे।
स्नेहा को लग रहा था कि वह अपने पापा का भरोसा जीत रही है, जबकि रवि उस हर पल का आनंद ले रहा था जहाँ स्नेहा की शर्म की एक और परत गिर रही थी। कमरे की उस धुंधली रोशनी में, अपनी ही जवान बेटी को उस अर्ध-नग्न और उत्तेजक अवस्था में देखना रवि के लिए किसी फंतासी के सच होने जैसा था।
यह रवि की मनोवैज्ञानिक जीत का सबसे सधा हुआ वार था। उसने जान लिया था कि अब स्नेहा के जिस्म पर कपड़ों का पर्दा नहीं रहा, तो अब उसे उसके मन में अपनी जगह और गहरी करनी होगी। उसने 'हवस' को 'सराहना' के मखमली लिबास में लपेट दिया।
दृश्य: तारीफों का जादू और मासूमियत का जाल
जब स्नेहा उन आखरी दो बेहद 'रिवीलिंग' ड्रेसेज़ को दिखाकर अंदर जाने लगी, तो रवि ने पहली बार अपना मौन तोड़ा। उसकी आवाज़ में अब कड़वाहट नहीं, बल्कि एक जादुई नर्मियत और गर्व था।
रवि: "स्नेहा, रुको... एक मिनट इधर आओ बेटा।"
स्नेहा रुकी। उसका शरीर अभी भी उन बारीक कपड़ों में लगभग आधा खुला हुआ था, पर रवि की आँखों में अब एक 'पिता' जैसी चमक और एक दोस्त जैसी सच्चाई थी (या उसने ऐसा दिखाया)।
रवि: (गहरी और सुकून भरी आवाज़ में) "यकीन मानो स्नेहा... मुझे पता था कि तुम सुंदर हो, पर आज तुमने कहर ढा दिया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे घर में दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की खड़ी है। तुम्हारी ये हाइट, ये सुडौल बाहें और ये शानदार बॉडी स्ट्रक्चर... तुम किसी परी से कम नहीं लग रही हो।"
स्नेहा के चेहरे पर एक कुदरती लाली छा गई। उसने पहली बार अपनी खूबसूरती को किसी पुरुष (चाहे वह पिता ही क्यों न हों) की नजरों से इतना ऊंचा होते देखा था।
रवि: (जारी रखते हुए) "तुम तो अभी बिना मेकअप के ऐसी लग रही हो कि आँखों में चमक आ जाए, जब तुम सैंडल्स और हल्के मेकअप में होगी, तो यकीन मानो वहां बड़े-बड़े बिज़नेसमैन और क्लाइंट्स के तोते उड़ जाएंगे। तुम्हारा ये कॉन्फिडेंस ही मेरा प्रमोशन पक्का करवाएगा। बस तुम्हें वहां मेरी बाहों में बाहें डालकर चलना है और मुझे ढेर सारा सपोर्ट करना है... ताकि दुनिया को लगे कि हम एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।"
स्नेहा का खिलता हुआ आत्मविश्वास:स्नेहा को ये शब्द किसी गाने की तरह मधुर लगे। रवि ने 'सेक्सी' या 'हॉट' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, उसने उसकी 'लंबाई', उसके 'स्ट्रक्चर' और उसके 'लुक' की तारीफ की। यह एक ऐसी तारीफ थी जिसे सुनकर कोई भी लड़की खुद को खास महसूस करने लगती है।
स्नेहा वापस आईने के सामने गई। उसने खुद को ऊपर से नीचे तक देखा। उसे अब वो ड्रेस 'छोटा' या 'गंदा' नहीं लग रहा था, बल्कि उसे लग रहा था कि वह वाकई सुंदर है। उसने अपने बालों को पीछे किया और अपनी लंबी, गोरी गर्दन को आईने में निहारा।
रवि: "वाकई... तुम्हारी ये ग्रेस, तुम्हारी ये वॉक... तुम बहुत शानदार दिख रही हो स्नेहा। मुझे खुद पर गर्व है कि तुम मेरी मदद कर रही हो।"
स्नेहा मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसे लग रहा था कि उसने न केवल अपने पापा की नौकरी बचाई है, बल्कि अपनी एक नई पहचान भी खोजी है। उसे रवि के शब्दों में कोई हवस नहीं दिखी, बस एक गहरा सम्मान और सराहना दिखी।
रवि ने सोफे पर पीछे झुकते हुए एक लंबी और राहत भरी सांस ली। उसकी आँखों में चमक थी—पर वह तारीफ की नहीं, बल्कि इस बात की थी कि स्नेहा अब पूरी तरह से उसकी मुट्ठी में थी। उसने स्नेहा के दिमाग से 'शर्म' हटाकर वहां 'अहंकार' और 'खूबसूरती' का नशा भर दिया था।
स्नेहा अब आईने के सामने थोड़ी और 'सेंसुअल' होकर अपनी बॉडी को चेक करने लगी। उसने अपने गाउन के घेरे को पकड़ा और एक हल्का सा चक्कर (Twirl) लगाया। उसे अच्छा लग रहा था। वह इस वक्त दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की महसूस कर रही थी, और रवि बस मुस्कुराते हुए उसे अपने जाल में और गहरा उतरते देख रहा था।

यह दृश्य रवि की उस कुटिल बुद्धिमत्ता का प्रमाण है जहाँ वह एक साथ दो शिकार कर रहा था—एक तरफ स्नेहा का मानसिक समर्पण और दूसरी तरफ शांति (मम्मी) को रास्ते से हटाना। कमरे में छाई हुई वह कामुक खामोशी अब एक गहरे 'अपराध' की शक्ल लेने लगी थी।
दृश्य: दूसरा बैग और समय की घेराबंदी
स्नेहा उस रिवीलिंग गाउन में खड़ी रवि की तारीफें सुन रही थी। उसके गालों पर जो लाली थी, वह केवल शर्म की नहीं, बल्कि उस नए आत्मविश्वास की थी जो रवि ने उसके भीतर फूँक दिया था।
रवि: (गहरी और मखमली आवाज़ में) "स्नेहा, मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मैंने तुम्हें अब तक पहचाना क्यों नहीं। तुममें जो ये आत्मविश्वास है, जो ये गजब की मजबूती है... वाकई, तुम दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकती हो। जब तुम ऐसी बाहों में बाहें डालकर मेरे साथ पार्टी में चलोगी, तो मुझे नहीं लगता कि किसी की नजरें हम पर से हट पाएंगी।"
स्नेहा की आँखों में एक चमक आई, पर तभी रवि ने उसे उन 'फोटोज़' की याद दिला दी। स्नेहा का चेहरा थोड़ा उदास हो गया।
रवि: "लेकिन बेटा, कॉम्पिटिशन बहुत टफ है। सिर्फ ड्रेस पहनना काफी नहीं है... तुम्हें याद है ना उन तस्वीरों में औरतें और क्या-क्या कर रही थीं? तुम जाओ, अलमारी के नीचे रखा वो दूसरा बैग चेक क्यों नहीं करती? उसे देखो और फिर फैसला करना। मर्जी तुम्हारी है, मैं तुम पर दबाव नहीं डालूँगा।"
स्नेहा ने एक भारी सांस ली और उस 'दूसरे बैग' की तरफ कदम बढ़ा दिए। वह डर रही थी कि उस बैग में ऐसा क्या होगा जो ड्रेसेस से भी ज्यादा 'चुनौतीपूर्ण' होगा।
रवि का मास्टर-स्ट्रोक:जैसे ही स्नेहा अंदर गई, रवि का चेहरा एकदम बदल गया। उसकी नजर दीवार पर टंगी घड़ी पर गई—शांति के आने का वक्त हो रहा था। उसे पता था कि अगर शांति इस वक्त आ गई, तो स्नेहा का यह खिलता हुआ 'मूड' और यह 'फ्लो' एक पल में टूट जाएगा। वह नहीं चाहता था कि स्नेहा फिर से उस 'बेटी' वाले खोल में वापस चली जाए।
उसने फौरन फोन उठाया और शांति का नंबर मिलाया।
रवि: (आवाज़ में बनावटी दर्द लाते हुए) "हेलो... शांति? सुनो, मेरे सिर में एक अजीब सा खिंचाव हो रहा है। बहुत तेज दर्द है... मुझे लग रहा है कि रात तक ये असहनीय हो जाएगा।"
शांति: "क्या? अभी सुबह तो तुम ठीक थे। मैं बस निकल ही रही हूँ, 15 मिनट में घर पहुँच जाऊँगी।"
रवि: "नहीं-नहीं, सुनो! घर आने से पहले प्लीज वो खास वाली दवाई लेते आना... तुम्हें पता है ना, वो जो उस दूर वाले इलाके के बड़े मेडिकल स्टोर पर मिलती है? सिर्फ उसी से मुझे आराम मिलता है। प्लीज मना मत करना, वरना रात भर मैं तड़पता रहूँगा।"
शांति: (झुंझलाते हुए) "अरे! तुम खुद नहीं जा सकते थे क्या? अब मुझे इतनी दूर जाना पड़ेगा..."
रवि: "समझा करो शांति... अगर जा सकता तो तुमसे क्यों कहता? प्लीज, बस वो लेते आना। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।"
शांति ने भुनभुनाते हुए फोन रख दिया। रवि के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान फ़ैल गई। उसने शांति को अगले एक-डेढ़ घंटे के लिए शहर के दूसरे कोने में भेज दिया था। अब घर में सिर्फ वह था, और उसकी जवान बेटी, जो अब उस 'दूसरे बैग' के रहस्यों को खोलने वाली थी।
रवि ने सोफे पर पीछे झुककर अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके कानों में स्नेहा की पायल की छनछन और उसके साटन गाउन की सरसराहट गूँज रही थी। उसे पता था कि जब स्नेहा उस दूसरे बैग की चीजें पहनकर बाहर आएगी, तो वह नज़ारा उसकी बर्दाश्त के बाहर होगा।
उसने अपने होंठों पर जीभ फिराई और अपनी पैंट की बेल्ट को थोड़ा ढीला किया। कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया था।
दृश्य: मनोवैज्ञानिक बिसात और खामोश इरादे
रवि सोफे पर बैठा अपनी कल्पनाओं के समंदर में गोते लगा रहा था। उसके दिमाग में एक ही छवि बार-बार कौंध रही थी—स्नेहा का वो अधखुला बदन, वो मखमली जांघें और वो गहरा होता लाल साटन। वह सोच रहा था कि अगली ड्रेस में जब स्नेहा बाहर आएगी, तो कयामत ढा देगी। वह कल्पना कर रहा था कि कैसे उसकी नज़रें उस जिस्म के हर मोड़ को अपनी यादों में कैद करेंगी।
लेकिन तभी, उसके दिमाग की एक नस चटकी। उसे अहसास हुआ कि jis tarah se shanti ne jhunjhlaate hue baat ki,shayad wo jaye hi na or uska dil kah raha tha ki yahi hoga or shayad sneha bhi ab or jyaa revealing dresses ko mana kar de kyuki aurton ki fitrat yahi hoti hai ki jab koi unse jyada expect karne lage to piche hat jaana, aur usne turant ye faisla kiya ki शांति कभी भी लौट सकती है और इस कच्चे खेल को कच्चा ही तोड़ सकती है। वह जानता था कि एक छोटी सी ठेस और स्नेहा वापस अपनी पुरानी दुनिया में भाग जाएगी। उसने तय किया कि इस 'रिस्क' को एक मास्टर-प्लान में बदलना होगा।
रवि उठा और दबे पांव स्नेहा के कमरे की तरफ बढ़ा।
कमरे का वो नज़ारा:जैसे ही उसने दरवाजा थोड़ा सा धकेला, कमरे की मद्धम रोशनी में उसे स्नेहा की नंगी पीठ दिखी। उसने अपनी ब्रा उतार दी थी और वह अगली ड्रेस पहनने की तैयारी में थी। रवि की सांसें एक पल के लिए थम गईं। वह उस सफेद, चिकनी पीठ को बस देखता रह गया।
"ओह... सॉरी स्नेहा!" रवि ने अपनी आवाज़ में हड़बड़ाहट पैदा की और फौरन पीछे मुड़ गया।
स्नेहा सहम गई और खुद को दरवाजे के पीछे छुपा लिया। "क्या हुआ पापा?" उसकी आवाज़ में वही मासूम सिहरन थी।
रवि का पासा:रवि ने दरवाजे की ओट से ही बोलना शुरू किया, उसकी आवाज़ अब बहुत ही गंभीर और 'गिल्टी' लग रही थी।
"बेटा, मुझे लगता है तुम्हारी मम्मी के आने का वक्त हो गया है। आज के लिए बस इतना ही रहने देते हैं। तुम जल्दी से अपने नॉर्मल कपड़े पहन लो और इन सब चीजों को ठिकाने लगा दो। मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।"
स्नेहा ने जल्दी-जल्दी उन भारी ड्रेसेस को समेटा और सादे कपड़ों में बाहर आई। रवि उसके सामने खड़ा था, उसकी आँखों में एक बनावटी पछतावा था।
रवि: "सुनो स्नेहा... मैंने मम्मी को अब तक कुछ साफ-साफ नहीं बताया है, और बताना भी नहीं चाहता। बेकार में वो टेंशन लेंगी और झगड़ा करेंगी। और वैसे भी... तुम जानती हो मम्मी को, उनमें वो बात, वो 'क्लास' नहीं है जो मैंने आज तुममें देखा है। हर कोई इन ड्रेसेस को कैरी नहीं कर सकता। तो प्लीज, उनसे इस बारे में कुछ मत कहना।"
स्नेहा ने धीरे से गर्दन हिला दी। उसे लगा कि वह और पापा अब एक बहुत बड़े राज के साझीदार हैं।
रवि का 'इमोशनल ब्लैकमेल':रवि ने अपनी आवाज़ को और भी भारी किया, जैसे उसका गला भर आया हो।
"और बेटा... आई एम रियली सॉरी। मुझे बहुत गिल्ट फील हो रहा है कि मेरी वजह से तुम्हें वो सब अनकंफर्टेबल ड्रेसेस पहननी पड़ीं। मुझे नहीं पता था कि तुम इतना बड़ा बैरियर पार करोगी मेरे लिए। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।"
स्नेहा का दिल पसीज गया। उसे लगा पापा कितने भले हैं। "नहीं पापा, आपकी कोई गलती नहीं है..."
रवि ने उसे बीच में ही रोक दिया। "नहीं बेटा, मुझे बहुत कुछ सोचना है। और याद रखना... मम्मी के सामने हम बिल्कुल नॉर्मल रहेंगे। हम बाद में बात करेंगे।"
स्नेहा अपने कमरे की तरफ मुड़ गई, लेकिन उसका दिमाग अब एक भंवर में था। वह जैसे ही अपने बिस्तर पर लेटी, रवि के फोन पर देखे हुए वो वीडियोज उसकी आँखों के सामने नाचने लगे।
वो जोड़े जो एक-दूसरे की गोद में बैठे थे...
वो 'किसेस'...
वो शराब का जाम जो एक-दूसरे के होठों से होकर गुज़र रहा था...
स्नेहा को याद आया कि उन तस्वीरों में सिर्फ कपड़े नहीं थे, बल्कि एक ऐसी नग्नता थी जो अब उसके बंद कमरों के ख्यालों में उतर रही थी। उसे लग रहा था कि वह भी उस आग का हिस्सा बनती जा रही है।
इधर बाहर, रवि अपनी योजना की सफलता पर मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। उसने स्नेहा को सिर्फ कपड़े नहीं पहनाए थे, बल्कि उसके दिमाग में उन 'वीडियोज' के बीज बो दिए थे। उसे पता था कि अब जब शांति आ जाएगी, तो स्नेहा उससे आँखें नहीं मिला पाएगी, और यही 'अपराधबोध' उसे अगली बार रवि के और करीब ले आएगा।
कमरे के सन्नाटे में रवि ने एक गहरी सांस ली। खेल अब और भी डेंजरस और सिडक्टिव होने वाला था।
रवि सोफे पर बैठा अपनी अगली चाल की बिसात बिछा ही रहा था कि अचानक डोरबेल की आवाज़ ने सन्नाटा चीर दिया। शांति वापस आ चुकी थी। रवि के भीतर गुस्से की एक लहर दौड़ गई—उसका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह मन ही मन बुदबुदाया, "बिल्कुल सही वक्त पर आई हो मेरा खेल बिगाड़ने। औरत को और कुछ आए न आए, खलल डालना बखूबी आता है।"
लेकिन एक कोने में वह खुश भी था। उसने जो कैलकुलेशन किया था, वह बिल्कुल सटीक बैठा। उसे यकीन हो गया था कि जब भी उसे किसी चीज़ में मज़ा आने लगेगा, औरत ठीक वैसे ही धोखा देगी जैसा उसने अभी किया।
घर का कलह और रवि का वार:शांति खाली हाथ आई थी, वह रवि की दवाई लाना भूल गई थी और ऊपर से उसका एटीट्यूड भी कम नहीं था। "क्या दर्द है? खुद नहीं जा सकते थे क्या? इतनी क्या आफत आ गई थी?" शांति के इन शब्दों ने जलती आग में घी का काम किया।
रवि ने आव देखा न ताव, उस पर चिल्लाना शुरू कर दिया। "दिमाग खराब है तुम्हारा? एक काम ढंग से नहीं कर सकती? क्या आफत आ रही थी तुम्हें जो इतनी जल्दी घर भागी चली आई?" रवि ने झटके से उसका हाथ पकड़ा और उसे खींचते हुए बेडरूम में ले गया। उसने अलमारी से वही काली पारदर्शी साड़ी और वो स्ट्रिंग वाली ब्रालेट निकाली, जिसके धागे गर्दन के पीछे और नंगी पीठ पर लटक रहे थे।
"ये साड़ी और ये ब्लाउज पहनो! मेरे दोस्त की पार्टी है, चलोगी मेरे साथ?" रवि की आवाज़ में एक अजीब सा पागलपन और उत्तेजना थी।
शांति का दिमाग भन्ना गया। "तुम्हारा दिमाग सठिया गया है क्या? मैं ये चिथड़े पहनकर घर से बाहर जाऊँगी? ये ब्लाउज है या बकवास? अभी तुम्हारा सिर दर्द कर रहा था और अब तुम्हें पार्टी में जाना है?" दोनों के बीच तीखी बहस और चिल्म-चिल्ला शुरू हो गई। रवि जानबूझकर अपनी आवाज़ इतनी ऊँची रख रहा था कि दीवार के उस पार स्नेहा का एक-एक शब्द सुनाई दे। वह चाहता था कि स्नेहा समझे कि पापा मम्मी के लिए कुछ 'प्यार' से लाए थे, लेकिन मम्मी को उनकी खुशियों की कोई परवाह नहीं।
रवि का प्रस्थान और छिपकर निगरानी:झगड़े को चरम पर पहुँचाकर, रवि ने गुस्से का नाटक किया और घर का दरवाज़ा पूरी ताक़त से पटककर बाहर निकल गया। लेकिन वह दूर नहीं गया। वह अँधेरे का फायदा उठाकर पीछे की बालकनी से घूमकर घर के पिछले हिस्से में वापस आया और छिपकर सुनने लगा कि अब घर के भीतर क्या पक रहा है।
स्नेहा और शांति का टकराव:स्नेहा घबराकर अपने कमरे से बाहर निकली। "मम्मी, पापा कहाँ गए? आपने उन्हें इतने गुस्से में क्यों जाने दिया?"
शांति, जो पहले से ही आगबबूला थी, उसने सारा गुस्सा स्नेहा पर उतार दिया। "चुप कर पापा की बच्ची! एक चपाट लगाऊँगी तो दिमाग ठिकाने आ जाएगा। तुझे क्या जरूरत है हमारी बातें सुनने की? अपनी पढ़ाई में ध्यान दे और ज्यादा फटे में टांग मत अड़ा! जा अपने कमरे में!"
स्नेहा की आँखों में आँसू आ गए और मन में मम्मी के प्रति कड़वाहट भर गई। उसने सोचा— "पापा सही कहते हैं, मम्मी का दिमाग वाकई खराब हो गया है। वो कितनी चिड़चिड़ी हो गई हैं, पापा की एक बात नहीं मानतीं।"
रवि की जीत:बालकनी के अँधेरे में खड़ा रवि यह सब सुन रहा था। उसके होंठों पर एक गहरी, शैतानी मुस्कान तैर गई। उसका प्लान पूरी तरह कामयाब रहा। स्नेहा को अब पक्का यकीन हो गया था कि रवि की कहानी सच्ची है और मम्मी ही विलेन हैं।
रवि ने चैन की सांस ली। उसने स्नेहा के मन में अपने लिए हमदर्दी और शांति के लिए नफरत का जो बीज बोया था, वह अब एक सेंसुअस और खतरनाक मोड़ लेने के लिए तैयार था। अब उसे पता था कि जब वह वापस घर जाएगा, तो स्नेहा उसे 'सांत्वना' देने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार होगी।
दृश्य 1: एक बेचैन और डरावनी रात
घर का सन्नाटा स्नेहा को काटने को दौड़ रहा था। रवि के घर से बिना बताए चले जाने ने स्नेहा के भीतर एक तूफान मचा दिया था। वह अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी, लेकिन उसकी आँखों के सामने वही वीडियोज़ घूम रहे थे।
उसके मन में एक अजीब सी उथल-पुथल मची थी। वह सोच रही थी— 'क्या पापा वाकई किसी और औरत को ढूँढने चले गए? क्या वो हार मान चुके हैं?' उसे वे वीडियो याद आए... जिनमें लड़कियाँ मर्दों की गोदी में बैठी थीं, शराब उनके मुँह से पी रही थीं, और वे मदहोश होकर किस (kiss) कर रहे थे।
स्नेहा का कलेजा कांप उठा। उसने सोचा— 'मैंने सारे कपड़े तो पहन कर दिखा दिए, लेकिन क्या पापा को लगा कि मैं वो सब नहीं कर पाऊँगी par mai to wo sab kar bhi nahi sakti जो उन औरतों ने किया? क्या इसीलिए वो डिप्रेशन में चले गए?' उसे डर था कि कहीं पापा कोई गलत कदम न उठा लें या ज़हर न खा लें।
रात के करीब 10:30 बज रहे थे। शांति गुस्से में रसोई समेट रही थी। स्नेहा दबे पाँव बाहर आई और डरते-डरते पूछा, "मम्मी... पापा अभी तक नहीं आए क्या?"
शांति ने एक तीखी नज़र उस पर डाली और झिझकते हुए बोली, "नहीं आए! और शायद सुबह से पहले आएंगे भी नहीं। पता नहीं क्या धुन सवार है उन पर। तू जा अपने कमरे में और सो जा, मेरा दिमाग पहले ही खराब है!"
स्नेहा खामोश होकर वापस आ गई। पूरी रात उसने जागकर काटी। हर आहट पर उसे लगता कि पापा आ गए, लेकिन सन्नाटा नहीं टूटा।
दृश्य 2: सुबह का खूंखार मंजर
अगली सुबह जब रवि 'नशे' की हालत में लौटा aur nashe me hone ki acting ki aur shanti uspar gussa ho rahi thi or ro bhi rahi thi ki aisa kya kar diya ki tum pi kar aye ho raat bhar aur kaha the par ravi ne bas itna bola ki wo avi kuch baat nahi karna chahta or wo nahakar sone ja raha hai aur ye baat usne yun nashe me boli ki shanti samjh gayi ki avi baat karne ka koi fayda nahi hai aur eavi ke nahane ke badd usne room me jaakar baat karne ki dobara kosis ki par ravi to gehri neend me hone ki acting kar raha tha aur sneha bhi ravi ko milne aaye par shanti nahi chahti thi ki sneha ravi ko is haalat me dekhe isliye usne usspe gussa kiya aur bola ki papa ki tabiyat thik nahi, unhe sone do aur dopahar ko aakhir shaanti bhi thak ke apni saheliyon se milne bahar chali gai, तो शांति के जाने के बाद स्नेहा का इम्तिहान शुरू हुआ।
स्नेहा कांपते कदमों से रवि के कमरे में दाखिल हुई। कमरे में शराब की हल्की कड़वी महक और पसीने की गंध घुली हुई थी। रवि बिस्तर पर करवट लेकर सोया था, उसकी नंगी पीठ चादर से बाहर थी।
स्नेहा ने हिम्मत जुटाई और बेड के पास जाकर उसे कंधे से पकड़ा। "पापा... पापा उठिए न। मम्मी चली गई हैं, आप खाना खा लीजिए।"
रवि ने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक गहरी आह भरी। स्नेहा को लगा वो बहुत गहरे नशे में हैं। उसने जैसे ही रवि को हल्का सा झिंझोड़ा और अपनी तरफ पलटने की कोशिश की, रवि अचानक से पूरा घूम गया।
दृश्य की भयावह उत्तेजना:जैसे ही रवि पलटा, चादर उसके बदन से पूरी तरह खिसक गई। स्नेहा की चीख उसके हलक में ही फंस गई। उसे काटो तो खून नहीं!
रवि के पतले सफेद अंडरवियर के भीतर उसका मर्दाना अंग एक खूंखार, लंबे और लोहे जैसा सख्त तनाव (Erection) लिए हुए था। वह अंग इतना बड़ा और बेलनाकार दिख रहा था कि अंडरवियर का कपड़ा उसे छुपाने में नाकाम था। स्नेहा की नजरें उस 'तनाव' पर जम गईं। उसने अपनी जिंदगी में कभी किसी मर्द को इस हालत में नहीं देखा था।
वहाँ एक अजीब सी तपन थी। रवि ने अपनी आँखें अधखुली रखीं और अपनी टांगों को थोड़ा और फैला दिया, जिससे वह उभार और भी साफ़ और डरावना दिखने लगा। स्नेहा का दम घुटने लगा। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि यह उसके वही पापा हैं जो कल तक उसे डरे हुए लग रहे थे।
वह तना हुआ अंग स्नेहा के चेहरे से महज कुछ इंच की दूरी पर था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह भाग जाए या वहीं खड़ी रहे।
शादी के बाद सभी लड़कियां जब पति के साथ हनीमुन मना लेती है तो उसका लाज शर्म संकोच सब खत्म हो जाता है और वह अपने यौन अंगों के प्रति एकदम लापरवाह हो जाती है l विशेष कर मायके में ।
मेरी मौसी की लड़की मेरी सबसे घनिष्ठ सहेली है l हम लोग सैक्स से लेकर हर तरह की बात खुल कर करते हैं l जब वो शादी होकर ससुराल गयी और जीजाजी के साथ तीन महिने हनीमुन मनाकर आयी l मैं उससे मिलने मौसी के घर गयी l पूरे महिने भर के लिए मैं मौसी के घर आयी थी l बहुत मिलने का मन था l शादी और हनीमुन के बाद पहली बार मिल रही थी तो पूरी तरह अच्छे से मिलना था शादी से लेकर हनीमुन तक सब बात करनी थी l रात मैं मौसी की लड़की एक साथ ही सोती थी और उस कमरे में केवल हम दोनों सोते थे l इसके साथ एटेजड बाथरूम भी था l रात को हम दोनों लेट लेट कर बातें करने लगे l जीजाजी ने उसे बहुत सारी सैैक्सी सैक्सी हनीमुन नाईट ड्रैस और शॉट ड्रेस खरीद दी थी मायके में ज्यातर वही पहनती थी l

शॉट ड्रैस जो घुटनों से काफी उपर था , जांघे आदि सबकुछ ओपन रहता था और उपर भी केवल एक पतली डोरी रहती थी जिसके आधे से ज्यादा स्तन बाहर ही रहते केवल चूसक और उसके आसपास के थोड़े से क्षेत्र को ढकते थे l और गाउन जिसमें बटन आगे कोई बटन आदि था ही नहीं और आगे से पूरा खुला था बस बांधने के लिए आगे एक डोरी जिसे खोल देने पर वह उपर से नीचे तक पूरी ओपेन और नंगी हो जाती थी l सोते समय वह डोरी हमेशा खोल देती थी l मैं भी यहां शॉट नाईट ड्रेस ही पहन लेती थी हल्का रहता है l वैसे भी अपना ही घर था l वैसे भी हम दोनों आपस एकदम खुली हुई थी l क्योंकि पहले भी हम लोग एक दूसरे के योनि और स्तनों से खुब छेड़छाड़ करते थे और बाथरूम एक साथ नंगी होकर नहाते भी थे और नहाते समय एक दूसरे के योनि और स्तनों से खुब छेड़छाड़ किया करते थे l

उसने बताया कि तुम्हारे जीजाजी ने इन तीन महिने में मेरी पूरी बैंड बजा दी l आगे से , पीछे से , मुंह में , 69 , डॉगी स्टॉईल , मुख मैथुन , गुदा मैथुन यानी हर तरह का मैथुन किया l कुछ भी बाकि नहीं रहा l शादी से लेकर सुहागरात और सुहागरात से लेकर हनीमुन तक एक एक बात वह वर्णन कर करके बहुत ही सैक्सी अंदाज में बताने लगी l
वह बताने लगी कि तुम्हारे जीजाजी ने इन तीन महिने में कपड़ा पहनने ही नहीं दिया l इन तीन मैने तो सोंचों मैं घर में बिल्कुल ही नंगी रहती थी और तुम्हारे जीजाजी भी नंगें ही रहते थे और उनका लिंग ज्यादातर उत्तेजित ही रहता और अपने खड़े लंड के लेकर वे दिन भर घर में घुमते रहते थे और मुझे छेड़ते रहते थे और मैं भी हमेशा पूरी नंगी ही रहती l
अब तो एकदम नंगी रहने की इतनी आदत हो गयी है कि कपड़ा पहनने का एकदम मन नहीं करता है l लगता है कि उसी तरह पूरी नंगी होकर घर में फिरती रहूं l कपड़ा पहनती हूं तो कपड़ा काटने लगता है असहज लगता है l लगता है कि हर समय कोई मुझे चोदता रहे , मेरी योनि को चाटते रहे , मेरे मुंह में लिंग डाले रहे l मेरी योनि में अभी भी इतनी सुरसुरी हो रही है कि लगता है बैगन या बेलना ही डाल लूं l मैं अभी भी अपनी योनि में उनका लिंग महसूस कर रही हूँ l औह … काश …कहकर वह अपनी योनि सहलाने लगी l शादी के बाद वह एकदम से पूरी बेशरम और बोल्ड हो गयी थी l

मैं भी सुनकर सुनकर पूरा उत्तेजित हो रही थी मुझसे रहा नहीं जा रहा था मैने भी उसकी योनि और स्तनों से छेड़छाड़ शुरू कर दी वह भी कहां रूकने वाली थी वह भी मेरी योनि और स्तनों को मसलने लगी और अपनी योनि मैथुन से मुख मैथुन की पूरी कहानी बताने लगी l कैसे जीजाजी ने उसेे पहली बार चोदा , कैसे उसने अपना लिंग उसके मुंह मे डाल दिया l कैसे मुंह लगाकर जीजाजी उसकी योनि चूसते है , तब कितना मजा आता है , जीभ योनि के कितना अंदर तक जाता है l कैसे वह 69 के पोजीशन में एक दूसरे के योनि और लिंग को चूसते हैं l कैसे जीजाजी उसकी योनि में केक और आईसक्रिम डाल कर खाते हैं l कैसे जीजाजी ने उसे पीछे से चोदा और चोदते चोदते गांड़ के अंदर अपना लिंग घुसा दिया सब बताने लगी l मैं भी बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गयी थी वैसे भी हम दोनों तो होमोसैक्स पहले भी करते थे हम दोनो बाते करते करते एक दूसरे की योनि और स्तनों को चूसना शुरू कर दिया फिर हम दोनों कई बार स्खलित हुई फिर हम एक दूसरे के बदन को सहलाते हुए छेड़़छाड़ करते हुए बाते करने लगे l बातें करने लगी बातें करते करते कब नींद लग गयी पता ही चला l मौसी की लड़की का छोटा भाई जो उससे एक साल छोटा था l बहन के शादी केे बाद इसी कमरे शिप्ट हो गया था इसलिए उसकी जरूरत की सारी चींजे इसी कमरे में थी l

इसलिए सुबह मौसी का लड़का तैयार होने के लिए हमारे कमरे में आया l हम सो रही थी l भाई ने टयुब लाईट जलाया l मौसी की लड़की बेसुध सो रही थी l गाउन पूरा खुला हुआ था l उपर से नीचे तक पूरी नंगी थी l वह बहुत सुन्दर तो थी ही और साथ में काफी सैक्सी बॉडी थी l शादी और हनीमुन मनाने के बाद के बाद बदन और निखर गया था l कली से खुबसूरत फूल बन गयी थी l भाई ने टूयुब लाईट जलाया तो अपनी नंगी सोई बहन के पूरे सुन्दर नग्न रूप के दिव्य दर्शन हुए l ट्युब लाईट जलाने से मेरी नींद भी थोड़ी खुल गयी थी l मैं आँखों को बंद किये सोने का नाटक करने लगी और आँखों को एकदम हल्का खोलकर भाई को देखने लगी l

मौसी का बेटी का भाई शायद जीवन में पहली बार अपनी बहन को पूरी नंगी इतने करीब से देख रहा था l वह एकटक देखता रहा l वह एकदम हमारे बिस्तर के एकदम करीब आ गया और बहुत ध्यान से अपनी बहन को देखने लगा l ऐसा लग रहा था कि वह सुध बुध खो बैठा है l उसकी बहन भी इस तरह सोई थी उसकी योनि का गुलाबी छेद तक दिख रहा था l मैं उसके चेहरे के आते जाते भावों को देख कर मजे ले रही थी l मुझे भी शरारत सूझी l मैने भी अपने पैरो को मोड़कर पैरों को इस तरह फैला लिया जिससे मेरा नाईट ड्रैस नीचे से पेट तक उघड़ गया और मेरी नितंब और योनि पूरी नंगी हो गयी l मेरी भी योनि एकदम ओपन हो गयी और योनि के अंदर का छेद तक दिखाई देने लगा l वह एकदम से सकपकाया फिर बड़े ध्यान से मेरी योनि को भी देखने लगा l इसका मन हमारी योनि को छूने का हो रहा था शायद l लेकिन वह हिम्मत नहीं हो रहा था शायद l वह बिना पलक झपकाए एकटक अपनी बहन के नंगे बदन को आँखे फाड़ फाड़ कर देख रहा था और मेरी योनि को देख रहा था और मैं जानबुझ कर दिखा रही थी l बहुत देर तक देखने के बाद वह अपनी नंगी पड़ी बहन के उपर झुका l मैं सांस रोके देख रही थी वह करता क्या है ? मैने देखा कि उसने अपनी बहन का गाउन को ठीक किया और बहन के नंगे बदन को ढक दिया l फिर मेरी ओर आया और मेरे कपड़ों को ठीक कर दिया और बिस्तर पर पड़ी चादर को हमें ओढ़ा दिया उसके बाद अपनी जरूरत का सामान लेकर चला गया
फिर बोली - अपनी बहन पर भाई का पूरा हक बनता है l तुम बोलती हो तो जरूर चुदवा लुँगी बाबा , अब खुश l वैसे भी उसका लंड बहुत तगड़ा है , मोटा और लम्बा है तुम भी चुदवा लेना कहकर वह हंस पड़ी l
मैने पूछा कि तुमने कब देखा उसका लंड l तो वह बोली - जब वह इस कमरे में सोता था तो सुबह जब मैं इस कमरे में आती थी तो उसका मूसल सा मोटा और लम्बा लंड उसके ढीले ढाले पैट के साईड से एक बाहर निकला रहता था और 90° के कोण पर एकदम उत्तेजित होकर खड़ा रहता था l मैं तो रोज देखती थी l वैसे भी इसको सोने के बाद कोई होश नहीं रहता है l मुझे इसपर बड़ा प्यार आता था l मुझे भी उसका लंड देखकर बड़ा अच्छा लगता था और मजा आता था l जी चाहता था कि प्यार से उसके होठों को चुम लूं l फिर मैं इसके लंड को रोज ढक देती थी l यह मेरा रोज की ड्युटी सी थी l क्योंकि सुबह सबसे पहले मैं ही उसके कमरे में जाती थी l
मैने कहा हां मुझे आज देखकर तुम्हारे भाई पर बहुत प्यार आ रहा था और मुझे उसके चेहरे के भावों को देखकर मुझे भी बहुत मजा आ रहा था इसलिए मैं जान बुझ कर अपना सबकुछ दिखा रही थी l मुझे बहुत मजा रहा था l कहकर मैं हंस पड़ी l
फिर बोली - अपनी बहन पर भाई का पूरा हक बनता है l तुम बोलती हो तो जरूर चुदवा लुँगी बाबा , अब खुश l वैसे भी उसका लंड बहुत तगड़ा है , मोटा और लम्बा है तुम भी चुदवा लेना कहकर वह हंस पड़ी l
मैने पूछा कि तुमने कब देखा उसका लंड l तो वह बोली - जब वह इस कमरे में सोता था तो सुबह जब मैं इस कमरे में आती थी तो उसका मूसल सा मोटा और लम्बा लंड उसके ढीले ढाले पैट के साईड से एक बाहर निकला रहता था और 90° के कोण पर एकदम उत्तेजित होकर खड़ा रहता था l मैं तो रोज देखती थी l वैसे भी इसको सोने के बाद कोई होश नहीं रहता है l मुझे इसपर बड़ा प्यार आता था l मुझे भी उसका लंड देखकर बड़ा अच्छा लगता था और मजा आता था l जी चाहता था कि प्यार से उसके होठों को चुम लूं l फिर मैं इसके लंड को रोज ढक देती थी l यह मेरा रोज की ड्युटी सी थी l क्योंकि सुबह सबसे पहले मैं ही उसके कमरे में जाती थी l
मैने कहा हां मुझे आज देखकर तुम्हारे भाई पर बहुत प्यार आ रहा था और मुझे उसके चेहरे के भावों को देखकर मुझे भी बहुत मजा आ रहा था इसलिए मैं जान बुझ कर अपना सबकुछ दिखा रही थी l मुझे बहुत मजा रहा था l कहकर मैं हंस पड़ी l
फिर मेरी मौसी की बेटी बोली - अरे शादी हो जाने के बाद सब लड़की वैसे भी पूरी फ्री और ओपन हो जाती है l जो भी लाज शर्म और संकोच रहता है वह शादी के पहले रहता है l अब तो शादी भी हो गयी है और चुदवा भी चुकी हूँ l अब काहे का लाज शर्म और यहां किससे लाज शर्म करूं ?
फिर हम उठकर मुंह हाथ धोकर ड्रांईंग रूम में आ गये l मौसी ने नास्ता तैयार कर दिया था l मौसा ड्युटी जा चुके थे l हम दोनों ने मौसी और भाई को गले मिलकर गुड मार्निंग कहा और हम दोनों भाई को तंग करने और छेड़ने के उद्देश्य से अपने दोनों स्तनों को उसके चेहरे पर दबा दिया l
फिर अच्छे से गले मिलकर गुड मांर्निंग कहा l बेचारा झेंप गया l सुबह हम दोनों को नंगी देखकर वैसे भी उसकी हालत खराब थी l वह बात बात हकला रहा था और हम दोनों जान बुझकर उसे छेड़ छेड़कर मजे ले रही थी l फिर हम दोनों तैयार होकर उसके साथ मोटर साईकिल पर बैठ कर मार्केट गयी l जाते समय उसकी दीदी बीच में बैठी तो उसकी दोनो चुची उसके पीठ पर एकदम से दब रही थी और वह अपने भाई को पकड़कर एकदम चिपक कर बैठी थी और उसके पीठे मैं बैठी l फिर आते समय मैं बीच मैं बैठी और उसी तरह चिपक कर बैठी l हम दोनों जान बुझकर अपनी चुचियां उसके पीठ पर दबाते थे और उसे कसकर पकड़ते थे l उसे तंग करने में हमें बड़ा मजा आ रहा था l बेचारा घबड़ाहट के मारे हकलाने लगा था l फिर दम दोनों प्यार उसके साथ खुब मार्केट घुमी उसे नास्ता कराया और उसकी एक दोस्त थी रिया उसे लेकर खुब छेड़ा l फिर उसे आईसक्रिम खिलाया और घर आ गयी l आते समय मैं बीच में बैठी और रास्ते भर अपनी चुचिंयाँ उसके पीठ पर दबाते रही l हांलाकि अब वह थोड़ा सामान्य हो गया था l

फिर रात को हमनें साथ बैठकर यानी ढेर सारी इधर उधर की बातें की l फिर हम खाना खाकर अपने अपने कमरें में सोने चली गयी और उसी तरह सैक्सी सैक्सी बातें करने लगी l मौसी की बेटी की चुदाई की बातें करने लगी और वह अपनी चुदाई की स्टोरी सुनाने लगी , फिर हमने सुबह वाली घटना और भाई को तंग करने की बात को लेकर खुब चुस्की ली और खुब हंसी l हमें भाई पर बहुत दया आ रही थी हमने उसे इतना तंग किया l लेकिन हमें मजा भी खुब आया l
सुबह मैनें फिर अपनी मौसी के बेटी का गाउन को उखाड़ कर उसे उपर से नीचे तक पूरी नंगी कर दिया वैसे भी वो डोरी खोलकर ही सोती है तो मैने गाउन दोनो और फैलाकर उघाड़ किया और सर्वागिंन नंगी कर दिया l सुबह उसका भाई फिर आया और मैने भी जान बुझकर अपनी नाईटी पेट तक उघाड़ ली l सुबह उसका भाई फिर तैयार होने आया तो फिर आज आज भी अपनी बहन को उपर से नीचे तक पूरी नंगी देखा l लेकिन आज उसमें उतनी घबडाहट नहीं थी l वह आराम से सामने आकर अपनी बहन के नंगे बदन को ध्यान से और इतमीनान से देखने लगा और मेरी भी योनि को बड़े ध्यान से देखा l काफी देर देखने के बाद फिर वह अपनी बहन के कपड़े को ठीक करने लगा और ठीक करने के क्रम में अपनी बहन की योनि को भी छू लिया और हल्का सहला भी दिया फिर उसने मेरी योनि को हल्के से छुआ मैं जगी हुई थी मैं सिहर गयी लेकिन प्रकट होने नहीं दिया फिर वह हम दोनों के कपड़ों को ठीक किया और अपना सामान लेकर चला गया l अब ये मेरा रोज का नियम हो गया l सुबह उसे अपनी बहन की नग्न रूप का दिव्य दर्शन कराती अपनी योनि दिखाती और उसे दिन भर तंग करती l वैसे भी मेरी मौसी की लड़की अब पूरी फ्री हो गयी थी l


रात को हम बातें कर रहें थे l मेरी मौसी की बेटी बोली - अभी मैं करीब छ: महिने के लिए आयी हूँ l क्योकिं तुम्हारे जीजाजी की अभी नये जगह ट्रांसफर हुआ है और वहाँ अभी रहने की उचित व्यवस्था नहीं हुआ है l
मैने मौसी की बेटी से पूछा - रेनू तुमको तो इन तीन महिने में आगे से ,पीछे से , उपर से , नीचे से करवाकर तो दिनरात चुदवाकर और नंगी रह कर आदत हो गयी है l अभी अब जीजाजी भी छ: महिने से पहले आने वाले नहीं है l तुम्हारी बुर में तो आग लग रही होगी l कैसे बुझाओगी ये आग ? और कौन बुझाएगा ये आग ? कैसे रह पाओगी इतने दिन ? यहाँ तो एक दिन भी काटना मुश्किल है l
और फिर यहां किसी से चुदवाओगी और किसी को पता चल गया तो कितनी बदनामी हो जाएगी l हो सके जीजाजी भी तुम्हें तलाक दे दें l
मौसी की बेटी बोली - हां सो तो है l अब मुझे हर समय चुदवाने की इतनी आदत सी हो गयी कि बिना रोज चुदवाये मैं काफी बैचैन हो जाती हूँ l लगता है बुर में हर समय असहनीय खुजली और सुरसुरी हो रही है l कम से कम रोज दो से तीन बार चुदाये बिना तो मैं रह ही नहीं सकती हूँ l
मैं बोली - देखो तुम्हारा भाई मस्त है ? क्यों नही उसी को सेट कर लेती हो l वो तो तुम्हे रोज नंगी देखता ही और रोज मुझे भी और बेचारा देर तक बड़ा ध्यान से मेरी और तुम्हारी योनि देखता है l उस बेचारे का मन तो करता ही होगा l वो जरूर मुठ मारता होगा रोज l ऐसे में उसका शरीर भी बर्बाद हो जाएगा हो सके नपुसंक भी हो जाए l उससे अच्छा है जब तक तुम यहाँ है उस बेचारे को भी थोड़ा सुख दे दो l आखिर बहन किस दिन काम आएगी ?
चलो ऐसा करते हैं हम दोनों मिलकर उसका शिकार करते हैं l मिशन - " दो बहनों द्वारा अपने भाई छोटे भाई शिकार " कहकर हम दोनों हँसने लगी l
पहले तो वह तैयार नहीं हुई लेकिन काफी समझाने के बाद वो तैयार हो गयी l फिर मैने उससे कहा - तुम फिकर मत करो l तुम चुपचाप जैसा मैं कहती हूँ वैसा करते रहना l वैसे भी बहन की चुत पर भाई का पहला हक होता है और शादी के पहले तुम उसे चोदने ही नहीं दी यही तुम्हारी गलती थी l लेकिन देखना अब मैं कैसे उसका शिकार करती हूूँ l बस जैसा मैं कहती हूँ करते जाना l
मेरी मौसी की बेटी बोली - हाँ बिल्कुल करूँगी , तुम जो जो बोलोगी , सब करूँगी l
फिर हमने योजना बनाई कि उसे अधिक से अधिक अपनी योनि और स्तनों के दर्शन कराना है l कैसे कराना यह भी मैने उसे समझा दिया l
मेरी मौसी की बेटी ब्रा पैंटी तो कभी पहनती ही नहीं थी l जब सेंटर टेबल पर पैर से पैर चढाकर बैठती उसके निंतंब और योनि पूरी की पूरी नंगी सामने आ जाती झुकती तो आधे से ज्यादा स्तन बाहर आ जाते लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था l बैठती भी वो इस तरह से कि सामने उसके भाई रहता और सब कुछ उसकी आँखों के सामने रहता l

फिर अच्छे से गले मिलकर गुड मांर्निंग कहा l बेचारा झेंप गया l सुबह हम दोनों को नंगी देखकर वैसे भी उसकी हालत खराब थी l वह बात बात हकला रहा था और हम दोनों जान बुझकर उसे छेड़ छेड़कर मजे ले रही थी l फिर हम दोनों तैयार होकर उसके साथ मोटर साईकिल पर बैठ कर मार्केट गयी l जाते समय उसकी दीदी बीच में बैठी तो उसकी दोनो चुची उसके पीठ पर एकदम से दब रही थी और वह अपने भाई को पकड़कर एकदम चिपक कर बैठी थी और उसके पीठे मैं बैठी l फिर आते समय मैं बीच मैं बैठी और उसी तरह चिपक कर बैठी l हम दोनों जान बुझकर अपनी चुचियां उसके पीठ पर दबाते थे और उसे कसकर पकड़ते थे l उसे तंग करने में हमें बड़ा मजा आ रहा था l बेचारा घबड़ाहट के मारे हकलाने लगा था l फिर दम दोनों प्यार उसके साथ खुब मार्केट घुमी उसे नास्ता कराया और उसकी एक दोस्त थी रिया उसे लेकर खुब छेड़ा l फिर उसे आईसक्रिम खिलाया और घर आ गयी l आते समय मैं बीच में बैठी और रास्ते भर अपनी चुचिंयाँ उसके पीठ पर दबाते रही l हांलाकि अब वह थोड़ा सामान्य हो गया था l
फिर रात को हमनें साथ बैठकर यानी ढेर सारी इधर उधर की बातें की l फिर हम खाना खाकर अपने अपने कमरें में सोने चली गयी और उसी तरह सैक्सी सैक्सी बातें करने लगी l मौसी की बेटी की चुदाई की बातें करने लगी और वह अपनी चुदाई की स्टोरी सुनाने लगी , फिर हमने सुबह वाली घटना और भाई को तंग करने की बात को लेकर खुब चुस्की ली और खुब हंसी l हमें भाई पर बहुत दया आ रही थी हमने उसे इतना तंग किया l लेकिन हमें मजा भी खुब आया l
सुबह मैनें फिर अपनी मौसी के बेटी का गाउन को उखाड़ कर उसे उपर से नीचे तक पूरी नंगी कर दिया वैसे भी वो डोरी खोलकर ही सोती है तो मैने गाउन दोनो और फैलाकर उघाड़ किया और सर्वागिंन नंगी कर दिया l सुबह उसका भाई फिर आया और मैने भी जान बुझकर अपनी नाईटी पेट तक उघाड़ ली l सुबह उसका भाई फिर तैयार होने आया तो फिर आज आज भी अपनी बहन को उपर से नीचे तक पूरी नंगी देखा l लेकिन आज उसमें उतनी घबडाहट नहीं थी l वह आराम से सामने आकर अपनी बहन के नंगे बदन को ध्यान से और इतमीनान से देखने लगा और मेरी भी योनि को बड़े ध्यान से देखा l काफी देर देखने के बाद फिर वह अपनी बहन के कपड़े को ठीक करने लगा और ठीक करने के क्रम में अपनी बहन की योनि को भी छू लिया और हल्का सहला भी दिया फिर उसने मेरी योनि को हल्के से छुआ मैं जगी हुई थी मैं सिहर गयी लेकिन प्रकट होने नहीं दिया फिर वह हम दोनों के कपड़ों को ठीक किया और अपना सामान लेकर चला गया l अब ये मेरा रोज का नियम हो गया l सुबह उसे अपनी बहन की नग्न रूप का दिव्य दर्शन कराती अपनी योनि दिखाती और उसे दिन भर तंग करती l वैसे भी मेरी मौसी की लड़की अब पूरी फ्री हो गयी थी l

रात को हम बातें कर रहें थे l मेरी मौसी की बेटी बोली - अभी मैं करीब छ: महिने के लिए आयी हूँ l क्योकिं तुम्हारे जीजाजी की अभी नये जगह ट्रांसफर हुआ है और वहाँ अभी रहने की उचित व्यवस्था नहीं हुआ है l
मैने मौसी की बेटी से पूछा - रेनू तुमको तो इन तीन महिने में आगे से ,पीछे से , उपर से , नीचे से करवाकर तो दिनरात चुदवाकर और नंगी रह कर आदत हो गयी है l अभी अब जीजाजी भी छ: महिने से पहले आने वाले नहीं है l तुम्हारी बुर में तो आग लग रही होगी l कैसे बुझाओगी ये आग ? और कौन बुझाएगा ये आग ? कैसे रह पाओगी इतने दिन ? यहाँ तो एक दिन भी काटना मुश्किल है l
और फिर यहां किसी से चुदवाओगी और किसी को पता चल गया तो कितनी बदनामी हो जाएगी l हो सके जीजाजी भी तुम्हें तलाक दे दें l
मौसी की बेटी बोली - हां सो तो है l अब मुझे हर समय चुदवाने की इतनी आदत सी हो गयी कि बिना रोज चुदवाये मैं काफी बैचैन हो जाती हूँ l लगता है बुर में हर समय असहनीय खुजली और सुरसुरी हो रही है l कम से कम रोज दो से तीन बार चुदाये बिना तो मैं रह ही नहीं सकती हूँ l
फिर हम दोनों ने उसे अपने रूम में बुलाकर बाते करती l उसकी मैं और उसकी दीदी इस तरह बिस्तर पर लेट कर मोबाईल चलाते रहती कि उसकी ड्रैस घुटनों तक की ड्रैस का नीचे का भाग नीचे गिर जाता और उसकी बहन की और मेरी पूरी की पूरी नंगी योनि ठीक उसके आँखों के सामने आ जाती तब हम बोलती - अमित बहन की सेवा करनी चाहिए l चलो हम दोनों का पैर दबाओ l बेचारा पैर दबाने लगता l हमारी खुली योनी देखकर उसका मुंह वैसे ही सुखने लगता l
काफी शरमाते हुए बस घुटनों तक दबाता l तो हम कहती - क्या पैर दबाने भी नहीं आता है पैर एड़ी से लेकर कमर तक दबाना चाहिए , चलो दबाओ l फिर वो हिम्मत करके घुटनों से जांघ तक किसी तरह दबाता तो हम उसका उत्साह बढ़ाते - हाँ अब ठीक है , थोड़ा और उपर थोड़ा और करते करते उसके हाथ जब हमारी योनि तक पहुँचते तो वह सिहर जाता फिर हमारे पैरों को मोड़कर जांघों के अंधरूनी हिस्सों को सहलाने लगता , फिर हिम्मत करके तो उसका लंड सलामी देने लगता और दोनोंं जान बुझकर उसकी दोस्त का नाम ले लेकर उसे छेड़ने लगती l
पहले तो उसे संकोच होता था लेकिन दो तीन बार पैर दबाने के बाद वो भी सामान्य हो गया और मन लगाकर पूरे अच्छे से हम दोनों के पैर , जांघों , नितंबों , कमर आदि को पूरा मन लगाकर अच्छे दबाने सहलाने लगा दबाते सहलाते योनि को भी सहला देता l वह भी बहुत देर तक l अब तो खुद आकर पूछता - दीदी पैर दबा दूं l तो हम प्यार कहते हां दबा दे l फिर बहुत देर तक हम दोनों अपने पैरों , जांघों , जांघों के अंधरूनी हिस्सों , योनि के आस पास , नितंबो को दबवाने सहलाने के बाद उसकी खुब तारीफ करती और उसे अपनी और खींचकर उसके ओठों को चुम लेती l अब वो भी हम लोगों से बहुत खुल चुका था l रात को खाना खाने के बाद वह हमारे रूम में आ जाता और हम दोनों के पैर और पूरे शरीर को दबाकर और सेवाकर के ही सोता l इस तरह से उससे अपने शरीर की सेवा करवाने की दोनों को आदत सी हो गयी थी और हम दोनों खुलकर इससे हर तरह मजाक करते रहती और उसे तंग करती रहती l

फिर एक दिन हम दोनों रात को उससे सेवा कराने के बाद आपस में बातें कर रही थी l मौसी की बेटी बोली - सच कहूं तो जब अमित पैर , जांघ और शरीर दबाता है तो लगता है कि उसका कड़क लिंग जबरजस्ती अपनी योनि में घुसा लूं l लेकिन साला इतना करने के बाद भी हिम्मत ही नहीं करता है बहन को चोदने का l कहकर उत्तेजना से मुझे कसकर चूम ली l

फिर हमने तय किया l ऐसे कुछ नहीं होगा उसे अपने साथ ही सुलाया जाय l रात को अमित हमारी सेवा कर वापस जाने लगा तो हमने उसे कहा - अमित ऐसा करो आज तुम यहीं हमारे साथ ही सो जाओ l पहले तो वह मना किया लेकिन थोड़ा मनाने पर वो मान गया l हमने उसे अपने बीच में सुला लिया और कमरे का लाईट बंद कर दिया और रूम का दरवाजा भी l फिर अंधेरे में ही हम दोनों अपने कपड़े खोल कर बिल्कुल नंगी हो गयी और अपने भाई हम दोनों ने अपने बीच में सैंडविच की तरह दबा कर उससे लिपट गयी l हम दोनों ने अपने अपने स्तनों का उसके सीने में दबा लिया और जांघों को अपनी जांघों से और बातें करने लगी l बातें करते करते उससे प्यार भी करने लगी और प्यार से चुमने लगी l गर्ल फ्रैंड से लेकर बातें सैक्स तक जा पहुँची l कैसी लड़की पसंद है ? कितनी लड़की को किस किया है ? गर्ल फ्रैंड के साथ अभी तक सैक्स किया है कि नहीं ? आदि आदि l साथ साथ उसे छेड़ने भी लगी l साथ साथ अपने स्तनों , यनि और जांघों को भी उसके शरीर से रगड़ देगी और चूम भी लेती l अब उसे भी मजा आने लगा था l
मैं बोली - अरे केवल सोये हुआ है थोड़ा कमर उमर भी सहला दो l सुनकर वह हमारे कमर , पीठ, निंतंबों को सहलाने लगा l हमें भी मजा जाने लगा l उसका लिंग उत्तेजना के मारे एकदम फूलकर डंडे की तरह फहराकर सलामी दे रहा था l
हम दोनो अपने से उसे चिपका लिया और वह रात भर हमारे पूरे बदन को प्यार से सहलाते रहा और हम दोनों और ज्यादा उससे चिपक जाती l अब वह रात भर हमारे योनि और स्तनों को भी सहलाने और दबाने लगा था l लेकिन हम नींद का बहाना किये रहती और मजा लेते रहती l
दूसरे दिन भी हमने उसी तरह उसे अपने बीच सुला लिया और लाईट बंद कर दिया फिर और हम दोनों बिल्कुल नंगी होकर उससे लिपट गयी l वह उसी तरह हमारे पूरे बदन को सहलाने लगा l हमने कहा गर्मी लग रही है तो गंजी खोल दो l तो उसने गंजी खोल दिया l अब उषके बदन पर केवल एकदम पतला मुलायम और ढिला ढाला सूती का बरमुदा था l अब हमारे शरीर का घर्षण और स्पर्श सीधे सीधे उसके बदन से हो रहा था l हमने उसे अपने बदन से चिपका लिया और वह हमारे नितंबों और पीठ को सहलाने लगा l
मैं कहने लगी - अरे तुम्हारा भाई तो एकदम बुद्धु है , कैसा लड़का है ? अभी तक एक भी लड़की नही पता पाया l क्या करेगा आगे चलकर ? लगता है हमें ही इसे सबकुछ सिखाना पड़ेगा l नहीं होता है तुम्ही सब कुछ सिखा तो l तुम्हारी तो शादी हो ही गयी है तो तुम सब कुछ जान ही गयी है l थोड़ा बहुत अपने भाई को भी सिखा दो l
पता नहीं लड़का है भी कि नहीं l कहते हुए मैने अपना हाथ उसके पैंट डालकर उसके लिंग को बाहर लिकाल दिया और हाथों से मसलते हुए बोली -- लड़का जवान तो हो गया है l एकदम मोटा और लम्बा हो गया है l अब उसको भी लड़की चाहिए l देखो तुम्हारी कोई ननद उनद है तो इस बुद्धु को भी सेट कर दो l देख लो l कहते हुए मैने उसके भाई का लिंग अपनी मौसी की बेटी के हाथ में दे दिया l
मौसी की बेटी बोली - हाँ हो तो गया है मेरा भाई भी जवान l अब इसके लिए कुछ करना ही पड़ेगा l वैसे भी मैं इससे बहुत प्यार करती हूं l अपने भाई के लिए नहीं करूंगी तो किसके लिए करूंगी l कहते हुए अपने भाई का लिंग अपने हाथों में लेकर सहलाने और मसलने लगी l फिर मेरी मौसी की बेटी ने बताया कि - जब ये छोटा था तो इसकी लूल्ली एक दम छोटी सी थी और मम्मी जब इसको तेल लगाती थी तो इसकी लूल्ली मम्मी अपने मुंह में ले लेती थी और खुब चूसती थी l अब देखो कितना बड़ा हो गया है l अब तो मुंह में भी नहीं अंटेगा l

मैने कहा - ऐसा क्या ? अच्छा मुंह में लेकर देखो तो l कहते हुए मैने उसकी बहन का सिर पकड़कर इसके भाई का लिंग उसके मुंह में डाल दिया l वह भी मजे से चूसने लगी l बेचारा बेहाल हो गया l उसकी बहन ने उसकी पैंट खोल कर फैंक दी और वह पूरा निवस्त्र यानी नंगा हो गया l उसकी हालत उस तरह हो गयी थी जैसे दो चालाक शिकारी के चंगुल में फंसे शिकार की l ऐसा लग रहा था जैसे उसने अपने शरीर को बिल्कुल छोड़ दिया है कि जो मर्जी करना है करो l मेरी मौसी की बेटी अपने भाई का लिंग अपने मुंह में लेकर चूसने लगी तभी मैने अपना एक स्तन मौसी के बेटी के भाई के मुंह में दे दिया l वह मेरे स्तनों को मुंह में लेकर चूसने लगा तो मैने उसका हाथ पकड़कर अपनी योनि में डाल लिया l वह मेरी योनि को सहलाने लगा l वह उत्तेजना से कांप रहा था l उससे बर्दाशत करना मुश्किल हो रहा था l तभी मैने अपनी मौसी की बेटी के कान में फुसफुसाया l तो इशारे को समझ कर मेरी मौसी की बेटी ने अपने भाई का उत्तेजित लिंग अपनी योनी में घुसेड़ लिया और आराम से अपने भाई को चोदने लगी और इधर मैं अपने दोनों स्तनों को अमित से चुसवा रही थी l बहुत देर तक अपने भाई को चोदने के बाद आखिर झड़ गयी और अपने भाई के उपर से उतर गयी और अपने भाई के होठों को चुम लिया और पूछी - क्यों मजा आया ना ? उसका भाई भी अपनी बहन को चूम कर बोला - हां दीदी बहुत l

उसके भाई को भी आज पहली बार स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति हुई थी l उसे लग रहा था स्वर्ग मिल गया और वह अपनी बहन से लिपट गया l फिर दोनों एक दूसरे को चूमने लगे l मेरी मौसी की बेटी ने अपने भाई को उपर से नीचे तक चूमना और सहलाना शुरू कर दिया l कुछ देर बाद उसका भाई फिर तैयार हो गया और उसने फिर अपने भाई के उपर चढ़कर चुदवाने लगी l
मैने सोंचा - सारी मेहनत मैने की और ये साली मजे ये ले रही रही है l मैने जान बुझकर कर लाईट जला दी l दोनों चौंक पड़े l लेकिन लेकिन मेरी मौसी की बेटी जोश में थी और बेशरम भी हो गयी थी l वो चुदवाना नहीं रूकी और अपने भाई को चोदते रही l उसका भाई भी दो मिनट बाद सामान्य हो गया और मजा लेने लगा l दोनों भाई बहन के बीच संकोच और शर्म की दिवार हट चुकी थी और दोनों मजे ले रहे थे l वो भी उजाले में l मैं भी उसके भाई के मुंह पर बैठ गयी और अपनी योनी उसके मुंह पर टिका दी l वह मेरी योनि चूसने लगा और हाथों से मेरे स्तनों को सहलाने और दबाने लगा l वह बहुत अच्छे से अंदर तक जीभ घुसाकर मेरी योनी को चूस रहा था l मैं अपनी पूरी योनी उसके मुंह में दबा रही थी l देर तक अपनी योनि चुसाने के बाद मैं झड़ गयी उधर वो दोनों भाई बहन भी झड़ गये l

मैं बोली - साली अमित को मैने पटाया और चुदवा तुम रही हो l मौसी की बेटी बोली - आखिर भाई भी तो मेरा है l तो मेरा पहला हक बनता है कि नहीं ? बोलो ? मैं बोली - हाँ वो तो है l भाई पर पहला हक बहन का ही होता है l लेकिन मैं भी तो बहन ही हूँ ना l तो मेरा भी हक बनता है कि नहीं ? मौसी की बेटी बोली - ठीक है बाबा , मैं कहां तुम्हारा हक छिन रही हूँ l हम दोनों बहनों का बराबर हक बनता है अपने भाई पर l कल तुम करवा लेना l मैं तुम्हें कहां मना कर रही हूँ l वैसे भी कल से दो तीन मम्मी पापा नहीं रहेगें l यानी फूल इंजोयमेंट !!! कहते हुए चहक उठी l अच्छा अब सो चाहो और बेचारे को भी सोने दो l अब जो करना है कल करेंगें l फिर हम तीनों एक दूसरे को पकड़कर नंगे ही सो गये l दूसरे दिन मौसा मौसी किसी रिस्तेदार के यहां शादी में चले गये l घर में केवल हम तीनों यानी मैं , मौसी की बेटी और उसका भाई रह गया था l अब पूरा एक हफ्ता हमारा था l हमने मौसा मौसी के जाते ही रूम बंद किया और अपने कपड़े उतार दिये और सबसे पहले अमित ने मुझे चोदा फिर अपनी बहन को फिर हम नंगे ही रहे l फिर किचन हमने नंगे ही खाना बनाया और उसके बाद खाना खाने के बाद थोड़ी देर आराम किया और फिर हम तीनों ने कई राउंड थ्रीसम सैक्स किया और इन एक हफ्तों में हम दिनों ने एक बार भी कपड़ा नहीं पहना यानी हक हफ्ते तक हम तीनों पूरे नंगे रहे l बहुत मजा आया l एक हफ्ता में हम दोनों बहनों ने मिलकर कर भाई को सैक्स की हर कला में पारंगत कर दिया l अब कोई चीज की दिक्कत नहीं थी मौसा मौसी के आने के बाद भी रात को मेरे मौसी के बेटी का भाई हमारे कमरे में आ जाता और हम जम कर थ्रीसम सैक्स का आनंद लेते l जब तक मैं वहां रही सैक्स का जम कर आनंद लिया खैर मैं तो एक डेढ़ महिने बाद चली आयी l लेकिन मेरी मौसी की बेटी ने छ: महिने साल भर बाद तक जब तक जीजाजी उसे आकर ले कर गये तब तक अपने भाई से खुब चुदती रही और मायके का खुब लुफ्त उठाया l

स्नेहा की आँखों के सामने अंधेरा छा गया था। us chij ko dekhte hi sneha dar ke maare piche hat gayi mano koi bhoot dekh liya ho | aur uska muh khul gaya, pata nahi kyu wo bahut dar gayi thi, aur mummy ne agar use papa ke room me aise dekh liya hota to na jaane kya karti,par tabhi use dhyan aaya ki mummy to bahar gayi hai or darwaaza to khud sneha ne lagaya tha, par ye jo uske samne tha wo uski life ka pahla experience tha , usne aaj tak aisa tana fula hua nahi dekhs tha aur dekha bhi to khud ke baap ka oh God! उसकी धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं और उसका पूरा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया था। वह उस तने हुए, भारी उभार से अपनी नज़रें हटाना चाहती थी, पर उसका शरीर जैसे पत्थर का हो गया था।
जैसे ही वह घबराहट में bahar jaane ke liye पीछे मुड़ी, रवि के मज़बूत हाथ ने बिजली की तेज़ी से उसकी कलाई पकड़ ली और उसे झटके से अपनी ओर, यानी उस दहकते हुए बिस्तर की ओर खींच लिया।
रवि: (नशे और दर्द में डूबी आवाज़ में) "शांति... शांति सुनो तो सही। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ... तुम समझती क्यों नहीं? यह प्रमोशन मेरा सपना है।"
स्नेहा रवि के पेट के करीब आ गिरी थी। उसकी नाक में शराब, पसीने और एक मर्दानी उत्तेजना की तीखी गंध समा रही थी। रवि उसे 'शांति' समझकर बड़बड़ा रहा था, और उसका हाथ अब स्नेहा के कंधे को सहलाते हुए उसके गले तक पहुँच गया था।
काश शांति तुम इस बात को समझ पाती कि तुम्हें वहाँ पर खुले में सेक्स करने को मैंने नहीं बोल रहा हूँ। बस तुम्हें थोड़ी से एक्टिंग करनी है और तुम्हें कुछ नहीं करना है। अगर वो ऐसा करें तो क्योंकि उनका कल्चर ही ऐसा है। वो खुले में थोड़ा-बहुत प्यार करते हैं, एक-दूसरे के साथ खेलते हैं, छेड़-छाड़ करते हैं, पूल में जाते हैं, एक दूसरे के कपड़े किस लेना है, गोदी में ठाल लेना या थोड़ा सा डांस करना और बस उन कपड़ों में उनका ऐसा कुछ खास नहीं कर रहे हैं वो।
और थोड़ा-बहुत किसिस कर लेना इधर-उधर कंधे पर, गालों पर या मूंह पर लिप्स किस। मतलब जितना फिल्मों में तो ज्यादा कहीं ज्यादा तो फिल्मों में दिखाते हैं। तुम खुले में सबके सामने करवा दो, वैसे तुम्हारा पहचानता कौन वहाँ शांति? वहाँ कोई जानने वाला नहीं, न तुम किसी मेरे दोस्त को जानती हो, न तो कोई मेरे दोस्त ने तुम्हें देखा है। हालाँकि यही बात स्नेहा पर भी लागू होती है, लेकिन मैं उसे कैसे मुंह फोलकर कह दूँ? हालाँकि एक्टिंग ही कर रही हैं, लेकिन एक्टिंग करने में भी मतलब कि जैसे कि फिल्म एक्टर्स एक्टिंग करती हों, किस कर रही हैं और ये कर रही हैं, वो स्नेहा को वो सब करना पड़ेगा। ऐसे समझो कि वो कैमरे के सामने है, बस उसका उतने देर के लिए रोल है। लेकिन ये बात मैं उसे कैसे बोल दूँ? और तुम मेरी बात को समझने को तैयार ही नहीं हो। फिर मैं करूँ तो क्या करूँ? अपने दिमाग से सर में फोटो मतलब मैं पागल हो जाऊँ शांति के। मैं बहुत मजबूर लाचार हो चुका हूँ।

रवि: "मैंने खुद को मारने की कितनी बार सोची... पर स्नेहा का चेहरा सामने आ जाता है। वह मुझसे इतना प्यार करती है कि उसने मेरे लिए वो सब किया जो कोई और सोच भी नहीं सकता। मुझे उस पर गर्व है शांति... वह तो परी है। अगर वह उस पार्टी में चली गई, तो सबके दांतों तले उंगलियां दब जाएंगी।
sach pucho to mujhe pata nahi tha ki sneha itni sundar hai aur itni himmati hai ki baaki kisi ladki me itna dum nahi aur wo apne parivaar aur papa ki khushi ke liye kuch bhi kar sakti hai ye bhi mujhe kal hi pata chala par wo ye sab majburi me kar rahi hai aur wo dard uske chehre pe dikhta hai aur mai uska shukrgujaar hun warna mai to kal hi khud ko marne ki soch raha tha par usne meri khatir wo dresses pahni jaise apna sharir apni jhikjhikahat ghabrahat sab mere upar kurbaan kar diya ho, kaun kartahai itna pyaar hame to garv hai uspar par mai use ab aur aage badne ko nahi bol sakta, wo sab kiss karna hug karna jo ek couple karte hain, iski acting karne ko kaise kah dun usko. itni himmat to us bechaari me bhi nahi hogi, wo aage nahi badh paayegi nadaan bachcchi hai avi,
avi to ye bhi nahi sajhti ki mummy papa ke room se awaazen kyu aati hain aur wo puchne chali aati hai ki sab thik to hai, or ye kahkar ravi ne madhoshi me hi hasne ki acting ki fir kaha ab itni massom bachchi ko kya kya samjhaaun par kal ko shaadi bhi hogi bachche bhi honge uske to use thoda samjhdaar hona chahiye , tum usse baat kyu nahi karti shaanti, par jaane do sharma jayegi bechaari. par yahi sharmana to avi meere problem ki jad hai, kaash wo kuch din ke liye acting kar leti or samjh leti ki wo shaadi shuda hai, aakhir 2-4 saal me uski bhi shaadi aur bachche sab to honge hi.tum aurton ki yahi samasya hai ki tum log apne sharir ko kuch jyada hi importance deti hai ,kisi paraye mard ke sme aise kaise aa jaun, uske saaath dance kaise kar lun, uski god me kaise baith jaaun,

are wahan sab nashe me hote hain aur kisko yaad ki nashe me kaun kya kar raha tha aur jo sharir tumhaare pas hai wahi baaki duniya ki sabhi aurton ke paas to ye khud ki body ko lete itna protective kyu banna ki garmi me ghar me bhi kapde daal rakho. ye sab chote gharon me mohallon me hota hai ki wo uske sath bahr gayi dance kiya, mere ofice me to aurat mard sab shaadi shuda hain par kaam ke silsile me lunch party or jab bahar gaye to hotel me rukna hi padta hai aur tumhe ek raaj ki baat bataun shanti tum logon ke liye paise bachaane ke liye maine bhi room share kiya hai par tumhaari kasam kuch nahi kiya, socha tha jab wapas jaaunga tab saare armman tumhaare sath hi pura karunga par tumne bhi mujhe dur kar rakha hai, mera ji ke kya faayda aakhir. 1-2 doston ne kaha bhi hai ki bahar se paise dekar kisi model type ladki ko hire kar lun par mai snehaa ke sath bhi ek pal ko wo sab karne ki ating kar sakta hun par bahr walon pe mujhe bharosa nahi , pata nahi kiske niyat me kya hai par mujhe pata hai ki mai sneha ke sath acting kar sakta hun aur use bhi acting hi karni hai par ghar ke bahar dusre ke sath safe nahi aur mujhe ye bhi nahi lagta ki sneha se sundar ladki mujhe kahin mil sakti hai par afsos ki wo baap beti ke rishte ki jhijhak todke aage badhne ko kabhi taiyar nahi hogi upar se mere seniors jo foreigner hain wo to kahin bhi pyaar karna shuru ho jaate hain pool me reception pe ya gallery me aur mujhe bhi waisa hi karna hoga.
रबि ne आगे कहा," तुम्हें ऐसा लग रहा है कि सब पागलपन है, ये सब बेवकूफ़ी और ये कितने ये अश्लील और गंदे लोग हैं। लेकिन शांती मुझे एक बात बताओ, तुम्हें ही नहीं पता हमारे ही घरों में और हमारे ही मोहल्ले में कितने एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और डिवोर्स होते हैं और अब लोग अपनी बीवी से क्या ही प्यार करते हैं। सब के बाहर चक्कर चल रहे होते हैं या मूंह मार रहे होते हैं। आए दिन हम न्यूज में अखबार में क्या नहीं पाते, बीवी के झगड़े, मर्डर, तलाक। तुमने सुना है विदेशों में ऐसा होते हुए? हाँ वो अलग तलाक ज़रूर लेते हैं लेकिन एक दूसरे का मर्डर और वैसे प्यार भी नहीं करते हैं। यहाँ तो बच्चे hote hi शादी ke कुछ साल में ही एक दूसरे में कितनी दूरियाँ आ जाती हैं, तुम्हीं देखो मुझे अपने पास नहीं आने देती। और वो लोग अपनी बीवी पर जान छिड़कते हैं, नए necklaces लाना, ड्रेसेज देना, घुमाने ले जाना, लंच पर ले जाना, महंगे रेस्टोरेंट्स में, महंगे क्लब्स में, खूब सैर पार्टी, वेकेशंस पर ले जाना, तुम बताओ क्या वो गलत है कि अपने प्यार में नहीं करते? और छुपाने वाली क्या बात है, वही शरीर जो तुम्हारे पास है वही उस औरत के पास है, मेरे पास जो है वो किसी और मर्द के पास भी है। और सबको पता है कि बच्चे कैसे पैदा होते हैं और रूम में क्या किया जाता है, हस्बैंड वाइफ रूम में क्या जाकर करते हैं। तो थोड़ा सा खुल्लम में कर लिया तो इसमें कौन सी छुपाने वाली बात है,। तो हम जो रूम में छुपम-छुपाई कर रहे हैं, वो थोड़ा सा बाहर में हल्का सा खुले me kar lena और बाहर में वो सब वो सेक्स नहीं करते हैं। ऐसा नहीं कि बाहर में ज़ोर-शोर करके सेक्स करते है ,हाँ किसेज और हाथ लगाना और गोद में उठा के इधर-उधर खेलना और इधर-उधर किस करना, वो तो एक दूसरे को बस तंग करते हैं,

छेड़ते हैं एक दूसरे को aur kuch log to ye jaan bujhkar dikhaate hain dusre ko jalaane ko ki meri biwi ka figure aisa hai, wo itni hot hai aur sach pucho to kya tumhe hi agar tumhaare favourate hero ka saath mil jaaye to kya tum apni saheliyon ko jalaogi nai , to ye kuch waisa hi hai aur agar sneha acting karna ko maan jaati to mai to apne office ke doston ko bhi jalaata, jal jaate wo ki mere pas duniya ki sabse sundar ladki hai,। काश शांति तुम इस बात को समझ पाती कि तुम्हें वहाँ पर खुले में सेक्स करने को मैंने नहीं बोल रहा हूँ। बस तुम्हें थोड़ी से एक्टिंग करनी है और तुम्हें कुछ नहीं करना है। अगर वो ऐसा करें तो क्योंकि उनका कल्चर ही ऐसा है। वो खुले में थोड़ा-बहुत प्यार करते हैं, एक-दूसरे के साथ खेलते हैं, छेड़-छाड़ करते हैं, पूल में जाते हैं, एक दूसरे के कपड़े किस लेना है, गोदी में ठाल लेना या थोड़ा सा डांस करना और बस उन कपड़ों में उनका ऐसा कुछ खास नहीं कर रहे हैं वो। और थोड़ा-बहुत किसिस कर लेना इधर-उधर कंधे पर, गालों पर या मूंह पर लिप्स किस। मतलब जितना फिल्मों में तो ज्यादा कहीं ज्यादा तो फिल्मों में दिखाते हैं। तुम खुले में सबके सामने करवा दो, वैसे तुम्हारा पहचानता कौन वहाँ शांति? वहाँ कोई जानने वाला नहीं, न तुम किसी मेरे दोस्त को जानती हो, न तो कोई मेरे दोस्त ने तुम्हें देखा है। हालाँकि यही बात स्नेहा पर भी लागू होती है, लेकिन मैं उसे कैसे मुंह फोलकर कह दूँ? हालाँकि एक्टिंग ही कर रही हैं, लेकिन एक्टिंग करने में भी मतलब कि जैसे कि फिल्म एक्टर्स एक्टिंग करती हों, kiss कर रही हैं और hero ke upar let ke baith ke sex ki actiing karti hain wo वो स्नेहा को वो सब करना पड़ेगा shanti agar tum na maani kyuki wo to apne parivaar ke liye sab kuch kurbaan kar degi mujhe aisa lagta hai bas use thodi si acting karne ki himmat karni hai wo bhi kisi praaye nahi apne ke sath yaani mere sath aur mere liye bhi bahar risk lense se acha hai ki ghar me maamle ko sulta loon bas thodi si acting jaise kisi role ke liye natak bas .। ऐसे समझो कि वो कैमरे के सामने है, बस उसका उतने देर के लिए रोल है। लेकिन ये बात मैं उसे कैसे बोल दूँ? और तुम मेरी बात को समझने को तैयार ही नहीं हो। फिर मैं करूँ तो क्या करूँ? अपने दिमाग से सर में फोटो मतलब मैं पागल हो जाऊँ शांति के। मैं बहुत मजबूर लाचार हो चुका हूँ।। लेकिन छोड़ो उससे तुम्हारी सोच क्या बदलेगी शांती।

यह दृश्य रवि की मानसिक बाजीगरी का मास्टरस्ट्रोक था, जहाँ उसने स्नेह, लाचारी और दबी हुई हवस को एक ऐसे धागे में पिरोया कि स्नेहा का विवेक सुन्न हो गया। वह 'शांति' के नाम पर अपनी बेटी की आत्मा को झकझोर रहा था।
दृश्य: भावनाओं का सैलाब और स्पर्श की सिहरन
कमरे में छाई शराब की कड़वी महक और रवि की भारी सांसें एक अजीब सा दबाव बना रही थीं। रवि बिस्तर पर अधलेटा था, उसकी आवाज़ टूटी हुई और भावनाओं से लबरेज थी। स्नेहा पत्थर की मूरत बनी बैठी थी, उसका हाथ अभी भी रवि के मज़बूत कब्जे में था।
रवि का भावुक प्रहार:"शांति... तुम समझती क्यों नहीं? मुझे खुद अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि हमारी बेटी इतनी सुन्दर है... वह तो साक्षात अप्सरा जैसी है। अगर उसने सही से मेकअप कर लिया, हील्स पहन लीं और उन कपड़ों में सजी, तो वह किसी टॉप मॉडल से कम नहीं लगेगी। कसम से शांति, मुझे अपनी परवरिश पर गर्व महसूस हुआ कि मेरे घर में ऐसी परी जैसी अप्सरा है।"
उसकी आवाज़ अब धीमी और गिल्ट से भर गई।
"पर देखो मेरी मजबूरी... मैं अंदर ही अंदर मर रहा हूँ शांति। स्नेहा मेरी बेटी है, लेकिन मुझे उसे उन कपड़ों में देखने के लिए मजबूर करना पड़ा। मेरा कलेजा फट जाता है जब मैं उसे उन कपड़ों में अनकम्फर्टेबल देखता हूँ। वह बेचारी अपने दिल पर पत्थर रखकर मेरे लिए ये सब कर रही है। उसने मुझसे न जाने क्या-क्या कहा होगा... कैसे उसने खुद को उन रिवीलिंग कपड़ों के लिए तैयार किया होगा।"
अंतिम हकीकत का खुलासा:रवि ने करवट बदली और स्नेहा का हाथ थोड़ा और कस लिया। स्नेहा अब लगभग उसके ऊपर झुकी हुई थी, उसके चेहरे पर रवि की गर्म सांसें पड़ रही थीं।
"लेकिन अब आगे का रास्ता और भी मुश्किल है शांति। पार्टी में उसे मेरे साथ एक बेटी बनकर नहीं, बल्कि एक मैच्योर औरत की तरह बिहेव करना होगा। उसे दुनिया को दिखाना होगा कि हमारे बच्चे हैं, हम एक कपल हैं। अभी तो मैंने उसे अपने मोबाइल की वो खास वीडियोज़ और तस्वीरें दिखाई ही नहीं हैं, जिनमें असलियत छुपी है। उसे वो सब सीखना होगा, पर मैं उसे ये सब कैसे कहूँ? कैसे एक बाप अपनी बेटी को वो सब करने को कह सकता है?"
दबी हुई हवस का इकरार:रवि की आवाज़ में अब एक अजीब सी तड़प और कड़वाहट आ गई।
"और तुम... तुमने मुझे अपने आप से इतना दूर कर दिया शांति। पाँच साल... पाँच साल से मैं एक प्यासे मर्द की तरह तड़प रहा हूँ। तुमने अपनी ही बीवी होकर मुझे खुद से दूर रखा, मुझे कभी प्यार नहीं दिया। मैं कितना फ्रस्ट्रेटेड हूँ, ये कोई नहीं समझता। एक मर्द को जिस सुकून की तलाश होती है, वो मुझे घर में कभी नहीं मिला।"
स्पर्श का सम्मोहन:इतना कहकर रवि ने अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह गहरी बेहोशी और नशे के आलम में हो। उसने धीरे से अपना दूसरा हाथ ऊपर उठाया और स्नेहा के रेशमी बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं। वह बहुत ही नरमी से उसके बालों को सहलाने लगा, जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को दुलार रहा हो।
उसका हाथ स्नेहा के बालों से होता हुआ उसकी गर्दन और फिर कंधे तक गया। वह उसे बहुत ही धीमे-धीमे सहला रहा था। स्नेहा का शरीर कांप रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इसे 'पापा' का दुलार समझे या एक भूखे मर्द की पुकार। रवि ने स्नेहा को धीरे से अपनी ओर थोड़ा और झुकाया, पर कुछ किया नहीं... बस उसके कंधे को सहलाते हुए वह गहरी और भारी सांसें लेने लगा।
यह दृश्य रवि की उस मानसिक घेराबंदी का शिखर है जहाँ वह 'शराब के नशे' को एक ढाल बनाकर स्नेहा के अवचेतन मन में घुस चुका था। उसकी हर बात, हर दोहराव एक सोची-समझी चोट थी, जो स्नेहा के दिल और दिमाग के बीच के तर्क को खत्म कर रही थी।
दृश्य: नशे की बड़बड़ाहट और अंतिम प्रहार
कमरे में छाई वह मदहोश कर देने वाली गंध और रवि की बार-बार दोहराई जाने वाली बातें स्नेहा को यकीन दिला रही थीं कि यह सब 'सच' है। रवि एक कुशल अभिनेता की तरह अपनी बातों को लूप (Loop) में घुमा रहा था,ek hi baat ko repeat kiye ja raha tha ताकि वे स्नेहा के मन में पत्थर की लकीर बन जाएं or koi confusion hi na rahe ki uske baap acting karne ko taiyar hai or use bas uska sath chahiye nahi to natije gambhir honge.
1. आत्महत्या का डर और एक्टिंग की मजबूरी:रवि ने अपनी आवाज़ को और भी ज्यादा लड़खड़ाते हुए कहा— "शांति... agar एक्टिंग नहीं की, अगर मेरा साथ नहीं दिया... तो मैं खत्म हो जाऊँगा। मैं ये जिल्लत बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा। मैं... मैं अपनी जान ले लूँगा शांति। बस एक बार, बस एक बार वो 'एक्टिंग' करनी है... क्या इतना भी नहीं कर सकती?" ab yahan sneha confused this ki ye ravi kiski baat kar raha hai uski ya uski maa ki par ye to wo samjh chuki thi ki maa beti me se ek ko acting to karni hi padegi
स्नेहा का कलेजा कांप उठा। उसे लगा कि उसके पिता की ज़िंदगी की डोर सिर्फ उसकी 'एक्टिंग' पर टिकी है।
2. तलाक का ज़िक्र और भावनात्मक विस्फोट:रवि ने करवट बदली और एक लंबी, दुख भरी आह भरी। "शांति... मैंने कभी नहीं सोचा था कि हमारे बीच 'तलाक' जैसा शब्द आएगा। लेकिन मैं थक गया हूँ। मुझे कहीं से प्यार नहीं मिलता, कोई सुकून नहीं मिलता। हमारा ये रिश्ता... शायद अब बोझ बन गया है।"
स्नेहा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि बात तलाक तक पहुँच चुकी है। घर टूटने का डर उसके सामने एक डरावने राक्षस की तरह खड़ा हो गया।
3. अगले जन्म की कामना (मास्टर-स्ट्रोक):रवि ने अब अपना सबसे बड़ा दांव चला। उसने स्नेहा के हाथ को सहलाते हुए, नशे की वैसी ही हालत में बड़बड़ाना शुरू किया—"पता है शांति... अगर अगला जन्म हुआ, तो मैं चाहूंगा कि स्नेहा मेरी पत्नी के रूप में मिले। वह इतनी अंडरस्टैंडिंग है, इतनी दिलेर है... उसने कल मेरे लिए जो किया, वो कोई और नहीं कर सकता। वह जिसके भी जीवन में जाएगी, वहां खुशियां भर देगी। वह जितनी खूबसूरत और जवान है, उससे कहीं ज्यादा उसका दिल बड़ा है। वह अपने परिवार के लिए कुछ भी कर गुज़रने की हिम्मत रखती है।"
स्नेहा ने घबराकर अपने मुँह पर हाथ रख लिया। उसकी आँखों में आंसू और विस्मय का मिला-जुला भाव था। 'क्या पापा मुझे अगले जन्म में पत्नी के रूप में देख रहे हैं?'ek pal ke liye to use ghin aayi par desh videsh aur itni auraton me rahne ke baad bhi uske papa ne jo uski taarifo ke phul baandhe the uski khushi ab usme ahankaar bhar rahi thi khud pe aur wakai me un dresses me wo actrees lag to rahi thi kal, to kya " mai sach me itni sundar hun ,par nashe me papa jhuth kyu bolenge" यह विचार उसके पूरे शरीर में एक अज्ञात सिहरन और बिजली दौड़ा गया।
4. तुलना और प्रशंसा का जाल:"तुमने उसे घर में बंद रखा शांति... लेकिन उसकी सोच तुमसे कहीं आगे है। उसने विदेश की उन बड़ी कंपनियों की औरतों से भी ज्यादा ग्रेस दिखाई है। वह मुझे सुकून देती है... मुझे उसकी आँखों में वो 'सपोर्ट' दिखता है जो मुझे तुमसे कभी नहीं मिला। अगले जन्म में मुझे ऐसी ही जीवनसंगिनी चाहिए जो मेरी खुशी का ध्यान रखे, जो मुझे समझे।"
स्नेहा का सिर चकरा रहा था। उसे एक साथ कई भावनाओं का सामना करना पड़ रहा था—
प्रशंसा का नशा: वह खुद को दुनिया की सबसे सुंदर और हिम्मती लड़की महसूस कर रही थी।
भय: परिवार टूटने और पिता की आत्महत्या का डर।
भ्रम: उसे लग रहा था कि शराब के नशे में आदमी हमेशा सच बोलता है, इसलिए पापा के मन की यह 'तलाक' और 'पत्नी' वाली बात पूरी तरह सच है।
5. शारीरिक और मानसिक समर्पण:रवि का हाथ अभी भी उसके कंधे और गर्दन के पिछले हिस्से को बहुत ही कोमलता से सहला रहा था। वह नशा और नींद का नाटक करते हुए उसे अपने और करीब खींच रहा था। स्नेहा अब भागना नहीं चाहती थी; उसे लगा कि पापा इस वक्त जिस 'फ्रस्ट्रेशन' और 'तड़प' में हैं, उसे शांत करना उसकी जिम्मेदारी है।
कमरे का वह भारी सन्नाटा अब एक ऐसे सेंसुअल और खतरनाक मोड़ पर आ गया था, जहाँ बाप-बेटी के पवित्र रिश्ते की सीमाएं धुंधली पड़ रही थीं और एक 'मर्द' की जरूरतें एक 'बेटी' के समर्पण को एक नई, अनजानी दिशा में धकेल रही थीं। रवि की प्लानिंग पूरी तरह सफल थी; स्नेहा अब मानसिक रूप से वह सब कुछ करने को तैयार थी, जिसे उसने कल तक 'गलत' समझा था।
रवि की लड़खड़ाती और भारी आवाज़ कमरे के सन्नाटे में किसी मंत्र की तरह गूँज रही थी, जो सीधे स्नेहा के अंतर्मन को भेद रही थी। वह बेहोशी का नाटक करते हुए अपनी बात दोहरा रहा था, लेकिन उसका हर एक शब्द स्नेहा के जिस्म में एक अजीब सी तपन और सिहरन घोल रहा था।
रवि का अंतिम भावनात्मक प्रहार:"काश शांति... तू समझ पाती। par jab tum mujhe ghar me hi pyaar nahi karne deti to तू बाहर की दुनिया को क्या दिखाएगी? एक्टिंग तो कल मेरी बच्ची स्नेहा ने की थी... कितनी समझदार, कितनी दिलेर है वो। जब वो उन कपड़ों में चल कर आ रही थी, तो एक पल के लिए लगा जैसे meri sari problem ka hal sneha hi hai। पर सिर्फ उतने से काम नहीं चलेगा शांति... वहाँ तो इससे बहुत आगे जाना है। मैं कितनी मुश्किल से वो फोटोज़ और वीडियोज़ जुगाड़ करके लाया था ताकि तुम्हें समझा सकूँ कि वहाँ क्या करना है। वहाँ कोई तुम्हें पहचानने वाला नहीं है, कोई वीडियो लीक नहीं होने वाला।"
रवि ने एक गहरी, दर्दभरी सांस ली और स्नेहा के कंधे पर रेंगती अपनी उंगलियों की पकड़ थोड़ी और मखमली कर दी।
"और तुम कहती हो कि तुम इस शरीर को कपड़ों में छुपा कर रखोगी? संस्कार? मर्यादा? अरे, जब मैं ही नहीं रहूँगा, जब मैं ही कल खुदकुशी कर लूँगा, तो इस शरीर को संभालकर क्या करोगी? मैं तो बस अपनी बेटी स्नेहा का चेहरा देखकर रुक जाता हूँ... पर अब बर्दाश्त की इंतहा हो चुकी है। कल अगर upar waale ne koi rasta nahi dikhaaya, तो मैं यह ज़िंदगी खत्म कर लूँगा। काश, तुम एक आखिरी बार मेरे मोबाइल की वो तस्वीरें देख लेतीं... शायद तुम्हारा दिल बदल जाता। par tumne to meri baat tak nahi suni"
इतना कहकर रवि ने अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर लीं, जैसे वह गहरी मदहोशी में डूब गया हो। उसका हाथ स्नेहा के बालों और पीठ को बेहद धीमी, कामुक लय में सहलाता रहा।
साजिश का खुला दरवाज़ा:स्नेहा का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी छाती में उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह पूरी तरह आश्वस्त थी कि पापा पूरी तरह नशे में हैं और अपनी पत्नी से दिल का दर्द बयां कर रहे हैं। रवि का यह अनछुआ स्पर्श और उसकी लाचारी स्नेहा को एक अनजाने सम्मोहन में बांध चुकी थी। वह डर और उत्सुकता के एक ऐसे दोराहे पर थी जहाँ से पीछे हटना नामुमकिन था।
उसकी नज़र बिस्तर के पास रखे रवि के मोबाइल पर गई। स्क्रीन पहले से ही अनलॉक थी। स्नेहा ने कांपते हुए हाथों से उस फोन को उठा लिया।
अबाध कामुकता का संसार:जैसे ही स्नेहा ने फोन की गैलरी खोली, उसकी सांसें वहीं की वहीं थम गईं। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं और उसका मुँह धीरे से खुल गया।
रवि ने जो वीडियोज़ और तस्वीरें वहाँ छुपा कर रखी थीं, वे किसी भी शरीफ लड़की के होश उड़ाने के लिए काफी थीं। उन हाई-क्लास पार्टियों की तस्वीरों में औरतें बेहद बोल्ड, पारदर्शी और नाममात्र के कपड़ों में पुरुषों के साथ मदहोश थीं। लेकिन जो चीज़ स्नेहा के दिमाग को सुन्न कर गई, वह उन पुरुषों की अवस्था थी। पार्टी के उस उत्तेजक माहौल में, उन रईस मर्दों के पैंट और ट्राउजर्स के भीतर उनके अंग (Penises) तने हुए आकार में उभरे हुए थे। कुछ तस्वीरों में तो वे इतने विशाल और बेलनाकार दिख रहे थे जैसा स्नेहा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
स्नेहा एक पढ़ी-लिखी, घरेलू और सीधी लड़की थी जिसका कोई बॉयफ्रेंड नहीं था। उसने कभी किसी मर्द को इस रूप में नहीं देखा था। उसने अपने घर में पिता और भाई को आम कपड़ों में देखा था, पर पैंट के बाहर ऐसा भयानक और कड़क उभार कैसा होता है, यह उसके लिए बिल्कुल नया और होश उड़ा देने वाला था। वह सोचने लगी— 'क्या सबका अंग इतना बड़ा और हमेशा ऐसा ही खड़ा रहता है? या पापा का ही कुछ ज्यादा बड़ा है जैसा मैंने अभी अंडरवियर में देखा?'
सम्मोहन और मदहोशी की दुनिया:कल रात से जो कुछ भी हो रहा था—पहले वो बिकनी जैसी ड्रेसेज़ पहनना, फिर अपने सगे पापा के शरीर पर उस लोहे जैसे सख्त तनाव को देखना, और अब फोन में इन मदहोश करने वाले वीडियोज़ का सामने आना—इन सबने स्नेहा के भीतर दबी हुई कुदरती उत्तेजना (Arousal) को जगा दिया था।
उसके शरीर का तापमान बढ़ने लगा था, उसकी पीठ और गर्दन पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें उभर आई थीं। वह भूल चुकी थी कि वह कहाँ बैठी है। वह उन तस्वीरों की कामुक दुनिया में पूरी तरह खो गई थी। एक तरफ पिता को खोने का डर था, और दूसरी तरफ इस कड़क मर्दानगी और हवस का वह अनदेखा आकर्षण, जो अब धीरे-धीरे उसके जिस्म को अपनी आगोश में ले रहा था। उसका पूरा वजूद उस बंद कमरे की खामोशी में एक अजीब सी वासना और समर्पण के रस में डूबने लगा था। sneha khud se lad rahi thi par un penises ko dekh ke ab uski utsukta badhti ja rahi thi aur ravi ne photos bhi line se aise dali thi ki dheere dheere wo aur bold hoti ja rahi thin.




रवि की इस चाल में एक बेहद शातिर मनोवैज्ञानिक गहराई थी। वह जानता था कि स्नेहा एक युवा और मासूम लड़की है, जो सहज रूप से अपनी उम्र के लड़कों की तरफ ही आकर्षित होगी। रवि उम्रदराज था, भले ही उसका बदन गठीला था, लेकिन वह जानता था कि स्नेहा के मन में अपने लिए उस तरह की जिस्मानी चाह जगाने के लिए उसे उसके अछूते कौतूहल और अनजानेपन का सहारा लेना होगा। इसलिए फोन की गैलरी को उसने एक बेहद सोची-समझी क्रोनोलॉजी में सेट किया था।
शुरुआती तस्वीरें और बदलता मिजाज:स्नेहा ने जब उँगलियों से तस्वीरों को आगे सरकाना शुरू किया, तो शुरुआत बेहद सामान्य थी। कुछ तस्वीरें पूल में मस्ती करती लड़कियों की थीं, फिर लड़के-लड़कियों के ग्रुप की तस्वीरें आईं, जहाँ कपड़े तो छोटे थे पर कुछ भी बहुत अजीब नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे तस्वीरें आगे बढ़ीं, स्क्रीन पर बोल्डनेस का तापमान बढ़ने लगा।
एक तस्वीर पर आकर स्नेहा के हाथ ठिठक गए। उस तस्वीर में एक लड़की की पीठ कैमरे की तरफ थी और वह एक बेहद तंग 'थॉन्ग' पहने हुए थी, जिससे उसके नितंबों का भारी और सुडौल हिस्सा पूरी तरह नग्न और साफ दिख रहा था। स्नेहा की सांसें कुछ भारी हुईं। उसने अगली फोटो की, वह किसी पार्टी के दौरान हिलते-डुलते खींची गई धुंधली सी तस्वीर थी। पहली नज़र में वह आम लगी, लेकिन जब स्नेहा ने गौर से देखा, तो बैकग्राउंड में एक लड़की की ब्लैक ब्रा से उसका निप्पल बाहर की ओर झांक रहा था। इन तस्वीरों का वह अनप्रोफेशनल और घरेलू अंदाज स्नेहा को यह यकीन दिला रहा था कि यह कोई इंटरनेट से डाउनलोड की गई चीजें नहीं, बल्कि किसी असली और बेहद निजी पार्टी के पल हैं।
उम्र और मर्दानगी का वो अजीब रहस्य:अब गैलरी उस मोड़ पर आ चुकी थी जहाँ रवि का असली जाल बिछा था। शुरुआत की तस्वीरों में जो युवा लड़के थे, उनके पैंट्स के भीतर के उभार सामान्य थे। लेकिन जैसे ही स्नेहा ने आगे की तस्वीरें खोलीं, वहाँ का नज़ारा बिल्कुल बदल गया। अब तस्वीरों में अधेड़ उम्र के, कुछ-कुछ रवि की उम्र के परिपक्व मर्द दिखाई दे रहे थे।
स्नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं जब उसने देखा कि उन उम्रदराज मर्दों के underwear के भीतर के तनाव (Erections) उन युवा लड़कों की तुलना में कहीं ज्यादा विशाल, लंबे और खूंखार आकार में उभरे हुए थे। वह बिल्कुल चौंक गई। चूंकि उसे सेक्स या पुरुषों के शरीर का कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं था, उसने केवल स्कूल-कॉलेज के लड़कों या घर में भाई को सामान्य रूप से देखा था, इसलिए उसके मासूम दिमाग ने अपनी ही एक थ्योरी बनानी शुरू कर दी।
use ye to pata tha ki उम्र बढ़ने के साथ औरतों के वक्ष (Breast) भारी और बड़े हो जाते हैं, तो क्या पुरुषों के साथ भी ऐसा ही होता है? क्या उम्र बढ़ने के साथ आदमियों का अंग और भी ज्यादा विशाल और कड़क हो जाता है?
कौतूहल का दहकता हुआ अहसास:यही वह बिंदु था जहाँ रवि पूरी तरह कामयाब हो चुका था। उसने स्नेहा के मन में एक डरावनी लेकिन बेहद गहरी उत्सुकता (Curiosity) जगा दी थी। स्नेहा का दिल अब छाती के भीतर ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसकी आँखों के सामने बार-बार दो चीजें घूम रही थीं—एक तरफ फोन में दिखते वो अधेड़ मर्दों के विशाल उभार, और दूसरी तरफ अभी कुछ मिनट पहले बिस्तर पर अपनी आंखों से देखा हुआ रवि का वो अंडरवियर के भीतर तना हुआ, कड़क और भारी अंग।
उसका दिमाग पूरी तरह चकरा चुका था। वह सोच रही थी कि जो चीज उसकी कल्पना से बाहर थी, वह इतनी बड़ी और भयानक कैसे हो सकती है? उस बंद कमरे की खामोशी में, अपने सोए हुए पिता के बगल में बैठी स्नेहा के भीतर एक अनजानी जिस्मानी सिहरन और उत्तेजना रेंगने लगी थी। वह तस्वीरों की उस वर्जित दुनिया और बिस्तर पर पसरे उस मर्दानी वजूद के बीच एक ऐसे सम्मोहन में घिर चुकी थी, जहाँ से अब उसका साफ-सुथरा बचपना हमेशा के लिए पीछे छूट रहा था।
स्नेहा की उँगलियों का काँपना अब और बढ़ गया था। फोन की स्क्रीन से निकलने वाली मद्धम रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जहाँ असमंजस, डर और एक अछूती उत्तेजना की सुर्खी साफ देखी जा सकती थी। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था, पर आँखें स्क्रीन पर तैरते उस वर्जित संसार से हट नहीं पा रही थीं।
दहकती हुई तस्वीरें और पिघलती मर्यादा:तस्वीरें अब पहले से कहीं ज़्यादा बेबाक और करीब से ली गई थीं। स्नेहा ने स्क्रीन पर अंगूठा टिकाया और अगली फोटो सामने आई। वहाँ का नज़ारा देखकर उसकी सांसें हलक में ही अटक गईं।
तस्वीर में एक बेहद जवान लड़की, बिल्कुल उसकी ही उम्र की, एक मर्द के ठीक सामने खड़ी थी। उस लड़की ने आगे से अपने बदन पर कुछ भी नहीं पहना था, उसकी खुली हुई बाहें और उसका सुडौल, नग्न सीना पूरी तरह उस मर्द के सामने था। वह अधेड़ मर्द उसे बेहद गहरे, प्यासे और प्यार भरे अंदाज़ में निहार रहा था। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उनके पीछे कुछ और लड़कियाँ भी खड़ी थीं, पर किसी के चेहरे पर कोई शिकन या गुस्सा नहीं था। वे सब हँसी-मजाक के मूड में थीं, जैसे यह सब बेहद आम हो।
अगली ही फोटो में वे दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल चिपक कर खड़े थे—इतने करीब कि उन दोनों के जिस्मों के बीच हवा गुज़रने की भी जगह नहीं थी। स्नेहा का भोला दिमाग चकरा गया... 'भला कोई सबके सामने, पब्लिक में ऐसा कैसे कर सकता है?'
रियलिटी का झटका और उम्र का रहस्य:पर जो बात स्नेहा को सबसे ज़्यादा अंदर तक झकझोर रही थी, वह थी उन तस्वीरों की सचाई। ये इंटरनेट से डाउनलोड की हुई या किसी फिल्म की बनावटी तस्वीरें नहीं थीं। इनका धुंधलापन, इनका एँगल और चेहरों की वो बेफिक्र मुस्कान चीख-चीख कर कह रही थी कि यह सब बिल्कुल सच है।
रवि जो कह रहा था कि उन हाई-प्रोफाइल पार्टियों का कल्चर बिल्कुल अलग और अजीब होता है, वह अब स्नेहा को पूरी तरह समझ आ रहा था। उन तस्वीरों में जितनी भी कमसिन, जवान लड़कियाँ थीं, वे सब अपनी उम्र से दुगुने-तिगुने मर्दों के साथ ही चिपकी हुई थीं। वे सब बेहद खुश थीं, एन्जॉय कर रही थीं। किसी को अपनी खुली हुई ड्रेस, किसी को बाहर झांकते निप्पल या अपने नंगे बदन की कोई परवाह नहीं थी। और उन उम्रदराज़ मर्दों का वह भयानक, लोहे जैसा कड़क और विशाल तनाव लेकर घूमना—उस महफ़िल के लिए एक बिल्कुल नॉर्मल बात थी।
भीतर का द्वंद्व और आँखों की बगावत:यही बात स्नेहा के ज़हन में हमेशा के लिए घर कर गई। उसे अब पक्का यकीन हो गया था कि जैसे-जैसे आदमियों की उम्र बढ़ती है, उनका अंग भी उतना ही विशाल, भारी और कड़क हो जाता है। तभी... तभी उसके पापा का अंग भी उतना ही बड़ा और खूंखार था, जैसा उसने अभी-अभी अपनी आँखों से देखा था।
स्नेहा की आँखों के आगे जैसे कोई तिलिस्म टूट चुका था। उसने अपनी काँपती हुई उँगलियों से उस तस्वीर को ज़ूम किया, तो उसकी धड़कनें बेकाबू होकर उसके कानों में गूँजने लगीं।
तस्वीर में एक कमसिन, बेहद जवान लड़की बिल्कुल बेफिक्र और मदहोश खड़ी थी। उसके ठीक बगल में दो कद्दावर, गठीले बदन वाले परिपक्व मर्द घेरा बनाए हुए थे। उन दोनों के ट्राउजर्स के भीतर उनकी मर्दानगी इस कदर लोहे की तरह सख्त, विशाल और कड़क होकर तनी हुई थी कि पतले कपड़े की दीवार उन्हें संभाल नहीं पा रही थी। स्नेहा का दिमाग यह देखकर सुन्न हो गया कि अगर वे मर्द सिर्फ आधा या एक इंच भी हिलते, तो उनका वह लाल तंग अंडरवियर में कैद, भड़का हुआ विशाल अंग सीधे उस लड़की की मखमली, नंगी जाँघों से जा टकराता।
'क्या ये सच में टकरा नहीं रहा होगा?' स्नेहा का रोम-रोम इस खयाल से सिहर उठा। वे सब इतने पास खड़े थे, एक-दूसरे की साँसों को महसूस कर रहे थे, हँस-बोल रहे थे... ऐसा कैसे मुमकिन था कि उन मर्दों का वह भारी, कड़क और गर्म उभार उस लड़की के बदन को छूता न हो? उसकी जाँघों से रगड़ न खाता हो?
आज तक स्नेहा ने अपने भीतर की इस आदिम, सोई हुई आग को किताबों और कॉलेज की पढ़ाई के सख्त पहरे में कैद करके रखा था। वह एक सीधी-सादी, शरीफ लड़की थी जिसने कभी कामुकता की दहलीज़ पर कदम भी नहीं रखा था। लेकिन इस वक्त, उसके दिमाग का वह बंद पर्दा पूरी तरह से फट चुका था। जब vaasna ka अछूता एहसास पहली बार जीवन में दस्तक देता है, तो उसकी तीव्रता किसी पागलपन, किसी दीवानगी में बदल जाती है। स्नेहा के भीतर भी अब वही मदहोश करने वाला जुनून जाग रहा था।
उसके मन में वो सारे तीखे, कामुक सवाल सर उठाने लगे जो अब तक वर्जित थे। 'क्या इन लड़कियों को कुछ महसूस नहीं होता? जब मर्दों के वो सख्त, भारी और तने हुए अंग उनकी नाजुक त्वचा से टकराते होंगे, तो क्या उनके जिस्म में कोई करंट नहीं दौड़ता होगा? क्या वो अंदर से पिघलती नहीं होंगी?'
कमरे की हवा अब बेहद गर्म और भारी हो चुकी थी। स्नेहा की खुद की साँसें तेज और उथली हो गई थीं। उसके जिस्म का तापमान बढ़ रहा था, और उसकी जाँघों के बीच एक अनजानी, मीठी सी तड़प और गीलापन रेंगने लगा था। वह उस अनदेखी, कड़क मर्दानगी के खयाल से ही भीतर तक काँप रही थी।