यह एक बाप-बेटी की कहानी होने वाली है, यह प्रेरणा नहीं है। इस तरह की कहानियाँ कुछ कम ही हैं। कहानी यथार्थवादी (realistic) लग सकती है क्योंकि दोनों के मन में पहले से ऐसी कोई भावना नहीं थी।
अध्याय 1: रेत और दहलीज़
रवि ने जब अपने घर की दहलीज़ पर कदम रखा, तो उसे लगा जैसे एक सदी बीत गई है। अरब की गर्मी, वहाँ के सख्त नियम ने उसके अंदर के मर्द को जैसे कहीं गहरी नींद में सुला दिया था। 5 साल तक उसने सिर्फ काली अबाया और नक़ाब ही देखे थे। वहाँ की मर्दाना दुनिया में रह-रह कर वह खुद भी एक मशीन बन गया था, जो सिर्फ पैसे कमाने के लिए चलती थी।
“अजी सुनते हो? चाय ठंडी हो रही है,” उसकी पत्नी शांति की आवाज़ आई।
रवि ने उसे देखा। शांति अब बदल गई थी। उम्र ने उसके चेहरे पर लकीरें और शरीर में एक ठहराव भर दिया था। लेकिन सबसे ज़्यादा बदलाव उसके रवैये में था। रवि के अंदर का अकेलापन और जिस्म की भूख अब भी जवान थी, लेकिन शांति को अब इन सब में कोई दिलचस्पी नहीं बची थी। वह भजन और घर-गृहस्थी में ही खुश थी।
उसकी बड़ी बेटी, स्नेहा, अब 18 साल की हो चुकी थी। मिडिल-क्लास परिवार के संस्कार उसमें कूट-कूट कर भरे थे। वह हमेशा दुपट्टा संभालती, नज़रें नीचे रखती और घर के कामों में शांति का हाथ बँटाती।
एक दोपहर, जब घर में सन्नाटा था और शांति पड़ोस में गई हुई थी, रवि अपने पुराने कमरे की तरफ जा रहा था। स्नेहा का कमरा रास्ते में पड़ता था। मिडिल-क्लास घरों में अक्सर दरवाज़े पूरे बंद नहीं होते, खासकर तब जब घर में सिर्फ परिवार हो।
रवि की नज़र गलती से आधे खुले दरवाज़े से अंदर चली गई।
स्नेहा वहाँ बिस्तर पर बैठी थी। उसने अपनी सलवार घुटनों से काफी ऊपर चढ़ाई हुई थी और वह बड़ी तवज्जो से अपने पैरों पर वैक्स स्ट्रिप रगड़ रही थी।
रवि की साँसें अटक गईं। दस सालों तक जिसने सिर्फ ढके हुए बदन देखे हों, उसके लिए स्नेहा की वो गोरी, चिकनी और जवान टाँगें किसी बिजली के झटके जैसी थीं। धूप की एक किरण खिड़की से आकर उसकी नंगी त्वचा पर चमक रही थी। वह दृश्य इतना साफ और इतना ‘रॉ’ था कि रवि वहाँ से हिल नहीं सका।
स्नेहा ने एक झटके से स्ट्रिप खींची और उसके मुँह से एक हल्की सी “आह” निकली। वह आवाज़ रवि के कानों में किसी पुराने राग की तरह गूँजी। उसे अचानक एहसास हुआ कि उसके सामने अब वह छोटी बच्ची नहीं, बल्कि एक पूरी जवान औरत थी।
उस पल, अरब की वह सारी रेत और ढकी हुई दुनिया उसके दिमाग से साफ हो गई। उसके इरादे, जो अब तक सिर्फ घर चलाने तक महदूद थे, अचानक एक नई और खतरनाक दिशा में मुड़ने लगे। उसने महसूस किया कि उसके अंदर का वह दरमंदग (deprived) हिस्सा अब जाग चुका था, और उसकी नज़रें अब स्नेहा को एक बेटी की तरह नहीं, बल्कि उस जिस्म की तरह देख रही थीं, जिसे वह सालों से तरस रहा था।
उसने दबे पाँव अपने कमरे की तरफ रुख किया, लेकिन उसके दिमाग में अब भी वही चमकती हुई नंगी टाँगें और वह हल्की सी कराह घूम रही थी।
अध्याय 2: खामोश तपिश और यादों का भार
उस दोपहर के बाद रवि के लिए घर की फिज़ा बदल गई थी। अरब की वह तपिश, जो पहले सिर्फ जिस्म को जलाती थी, अब उसके ज़ेहन में एक आग बनकर सुलगने लगी थी। वह जितना कोशिश करता कि वह दृश्य भूल जाए, उतनी ही शिद्दत से स्नेहा की वह नंगी और गोरी टाँगें उसकी बंद आँखों के सामने आ जातीं।
स्नेहा को अंदाज़ा भी नहीं था कि उसकी एक छोटी सी भूल—दरवाज़ा खुला छोड़ देना—आगे चलकर उसकी ज़िंदगी में कैसा तूफ़ान लाने वाली थी। उसे घर में अकेले रहने की आदत थी, इसलिए वह बेफिक्र होकर अपनी निजता (privacy) में रहती थी। लेकिन उस दिन बेड पर पसरी उसकी वे नरम, गोरी और लंबी टाँगों ने रवि के होश उड़ा दिए थे। रवि को लगा जैसे उसने अपनी आँखों के सामने किसी फ़िल्मी हीरोइन का कोई बेहद कामुक दृश्य देख लिया हो। उसका सर चकराने लगा था और वह समझ नहीं पा रहा था कि अपनी ही बेटी को देखकर उसके अंदर यह कैसी 'मर्दाना' प्यास जाग उठी है।
अगले दिन नाश्ते की मेज़ पर माहौल अजीब था। रवि हॉल में सोफे पर बैठा अखबार पढ़ने का नाटक कर रहा था, लेकिन उसकी नज़रें अखबार के ऊपरी किनारे से फिसलकर सामने खड़ी स्नेहा पर टिकी थीं। स्नेहा आज एक हल्का गुलाबी सूती सूट पहने थी। वह झुककर मेज़ साफ कर रही थी, और रवि की आँखें किसी भूखे शिकारी की तरह उसकी कामुक गोलाई (curves) को नाप रही थीं।
1. वह पहला स्पर्श और बदलती नीयत
रवि को याद आया कि जिस दिन वह घर आया था, स्नेहा ने आगे बढ़कर उसके पाँव छुए थे। उस समय जब वह झुकी थी, तो उसके कुर्ते के ढीले गले से उसकी छाती की वह भरपूर गोलाई (side boobs) अनयास ही रवि की नज़रों में आ गई थी। उस पल उसने इसे 'बेटी बड़ी हो गई है' वाली एक सहज भावना समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया था। लेकिन अब... अब बात कुछ और थी।
उस समय की वह मासूमियत अब रवि की आँखों में एक वर्जित प्यास (forbidden thirst) बन चुकी थी। वह अखबार के पीछे से अंदाज़ा लगा रहा था कि इन 5सालों में उसकी 'नन्ही गुड़िया' के शरीर के उभार कितने सख्त और भारी हो चुके होंगे। उसकी कल्पना अब मर्यादा की सरहदों को पार कर रही थी।
2. 'अखबार' का पर्दा और मानसिक माप
रवि ने देखा कि स्नेहा जब हाथ ऊपर उठाकर पंखा साफ करने की कोशिश कर रही थी, तो उसकी कुर्ती ऊपर खिंच गई, जिससे उसकी कमर की वह गोरी और पतली लकीर साफ़ दिखने लगी। रवि का गला सूख गया। वह मन ही मन उसकी जवानी का 'साइज' माप रहा था। उसकी कल्पना में वह अब एक पिता नहीं, बल्कि एक ऐसा मर्द था जो अपनी ही फसल को कटने के लिए तैयार देख रहा था।
उसे रह-रह कर वही दृश्य याद आ रहा था जब स्नेहा ने अपनी सलवार ऊपर चढ़ा रखी थी। वे मखमली जाँघें और उनकी चिकनाहट रवि के दिमाग में किसी नशे की तरह चढ़ रही थी। वह खुद की भावनाओं से लड़ तो रहा था, पर हारना उसे और भी सुहावना लग रहा था।
"पापा, आप इतना चुप क्यों हैं? तबीयत तो ठीक है ना?" स्नेहा ने अचानक उसकी तरफ मुड़ते हुए पूछा।
रवि हड़बड़ा गया, जैसे किसी ने उसे चोरी करते पकड़ लिया हो। उसने फौरन अखबार ऊपर कर लिया। "हाँ... बस थोड़ा थकान है," उसने भारी आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में वह 'भारीपन' था जो कामुकता और अपराधबोध के मिलन से पैदा होता है।
3. 'मर्यादा' का आखिरी युद्ध
नाश्ते के बाद, शांति मंदिर चली गई। घर में फिर वही सन्नाटा छा गया। स्नेहा रसोई में काम कर रही थी। रवि सोफे पर लेटा था, पर उसके दिमाग में वही 'पाँव छूने' वाला दृश्य, वे नंगी टाँगें और स्नेहा के शरीर की वह मदहोश कर देने वाली खुशबू घूम रही थी। वह अपनी इच्छाओं से लड़ने की कोशिश कर रहा था, पर अरब की वह 5 साल की भूख अब हर मर्यादा को निगलने के लिए तैयार थी।
उसने तय कर लिया था कि वह अब और इंतज़ार नहीं करेगा। वह देखना चाहता था कि यह 'अदृश्य खिंचाव' उसे और स्नेहा को किस मोड़ पर ले जाता है। उसे पता था कि वह आग से खेल रहा है, पर उस आग की गर्मी अब उसे अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत लग रही थी। वह अब उस 'फिल्म' का हिस्सा बनना चाहता था जिसे उसने अनजाने में देख लिया था।
अध्याय 3: खून और प्यास
रवि अपने कमरे में बेतहाशा चक्कर काट रहा था। उसके दिमाग में बार-बार वही छवि घूम रही थी—स्नेहा की वे गोरी और लंबी टाँगें, जो मोमबत्ती की रोशनी में किसी मखमली रेशम की तरह चमक रही थीं। उसे अपनी मर्दानगी में एक ऐसा तनाव महसूस हो रहा था जो उसने पिछले दस सालों में कभी नहीं जाना था।
उसने अपनी आँखें बंद कीं, तो उसे स्नेहा की जाँघों की वह चिकनाहट और उसकी 'आह' याद आ गई। उसका खून खौल रहा था। तभी शांति कमरे में आई। शांति ने एक गहरी लाल साड़ी पहनी थी, वह आज भी दिखने में काफी आकर्षक और गरम (hot) थी, लेकिन रवि की नज़रों में अब वह 'नयापन' नहीं था।
1. शांति पर 'जुनूनी' हमला
रवि ने अपनी बढ़ती हुई उत्तेजना को शांत करने के लिए शांति को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया। उसका हाथ शांति के ब्लाउज के अंदर घुस गया और उसने उसके उभारों को बेदर्दी से भींच दिया।
"अरे! ये क्या कर रहे हैं? थोड़ा सब्र रखिये... अभी बच्चे सोये नहीं हैं," शांति ने मुस्कुराते हुए उसे धकेलने की कोशिश की, पर उसकी आँखों में भी अपने पति के लिए चाहत थी। वह आज भी मदहोश कर देने वाली लग रही थी, लेकिन रवि के लिए वह सिर्फ एक 'इस्तेमाल किया हुआ माल' (used asset) थी।
रवि ने उसकी एक नहीं सुनी। उसने शांति को दीवार से सटा दिया और उसके होंठों को पागलपन की हद तक चूसने लगा। उसने शांति की साड़ी के पल्लू को झटके से हटा दिया और अपनी ज़ुबान उसकी नाभि (navel) के गहरे गड्ढे में उतार दी
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